उठो! जागो!

लक्ष्य की प्राप्ति तक रूको नहीं! -जयन्ती जैन


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होली शुभ हो! : शुभकामनाएँ कैसे ग्रहण करे ?

पुरे मन से दी शुभकामनाएँ अपने साथ कम्पन ,तरंग एवं ऊर्जा लाती है.उथला मन ,व्यस्त मन उन्हें नहीं ग्रहण कर सकता है. हमारी भी उन्हें ग्रहण करने की तैयारी होनी चाहिए। शान्त चित्त होने पर उनका अनुभव किया जा सकता है.
आज से हजारो वर्ष पूर्व इन त्यौहारों की संरचना की गई थी। आज के समय में इनका औचित्य समझना जरुरी है। अपने त्यौहारों को खुली आँख से देखना आवश्यक है।happy holi
मनुष्य उत्सव धर्मा है। वह सदैव आनन्द और मस्ती में पसन्द करता है। होली भी आनन्द दायक त्यौहार है।
हिरण्यकश्यप् की आदेश से ं अग्नि रोधी(फायर प्रुफ ) साड़ी पहन कर अग्नि में बैठने के उपरान्त होलीका भक्त प्रहलाद को उसके सद्गुणों के कारण जला नहीं पाती, बल्कि स्वयं जल जाती है।अथार्त  नकारात्मकता सत्य को मिटा नहीं सकती है।इस तरह बुराई पर अच्छाई की विजय का यह त्यौहार है। यह पतझड़ की विदाई पर खुशियां मनाने वाला त्यौहार है। बंसत के उल्लास का त्यौहार है।
होली जलाना दहन का प्रतीक है। अपने भीतर वर्ष भर के वैमनस्य, गंदगी व ईष्या को जलाने का त्यौहार है।यह मन के मैल को धोने का त्यौहार है। गाली, गलौच कर कड़वाहट को मिठास में बदलने का मौसम है।यह भीतर छिपी गन्दगी को बाहर लाने का अवसर है। मन की शुद्धता को उज्जवल करने का मौका पैदा कराता है।दूसरों का दिल न दुखाते हुए रंग डालने ,गंदे मजाक,हंसी उड़ाने, छेड़छाड़ करने व नंाचने गाने का त्यौहार है। इस तरह मन की भड़ास निकालने में यह त्यौहार सहायक है।
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दृश्य ही अर्थयुक्त /सत्य नहीं : सारभूत दिखाई न देनेवाला हैं

जगत में दिखनेवाला ही अर्थयुक्त नहीं है जो नहीं दिखता हैं वह कई बार वह महत्वपूर्ण होता हैं । जीवन में जो दृश्य प्रमाण को ही मानते है वे अधूरे हैं । शायद यहाॅ सारभूत अदृश्य है, सूक्ष्म हैं, अरूपी हैं । जीवन में सारभूत दिखाई न देनेवाला हैं । इन सबका कारण दिख जाए वह आप जान पाए यह जरूरी नहीं हैं । इसको पहचानने वाले जीवन के सत्य को पहचान पाते हैं । इसी पर ओशो द्वारा सुनाई गई एक कहानी याद आती हैं । Role of invisible -Rumi

एक फकीर, एक सन्यासी प्रभु की खोज में पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा था । वह किसी मार्गदर्शक की तलाश में था–कोई उसकी प्रेरणा बन सके, कोई उसे जीवन के रास्ते की दिशा बता सके। और आखिर उसे एक वृद्ध सन्यासी मिल गया राह पर ही, और वह वृद्ध सन्यासी के साथ सहयात्री हो गया । लेकिन उस वृद्ध सन्यासी ने कहा कि ‘मेरी एक शर्त है, यदि मेरे साथ चलना हो–और वह शर्त यह है कि मैं जो कुछ भी करूं, तुम उसके संबंध में धैर्य रखोगे और प्रश्न नहीं उठा सकोगे। मेैं जो कुछ भी करूं, उस संबंध में मेेैं ही न बताऊं, तब तक तुम पूछ न सकोगे । अगर इतना धैर्य और संयम रख सको तो मेरे साथ चल सकते हो।’
उस युवक ने यह शर्त स्वीकार कर ली और वे दोनों संन्यासी यात्रा पर निकले। पहली ही रात वे एक नदी के किनारे सोये और सुबह ही उस नदी पर बंधी हुई नाव में बैठकर उन्होने नदी पार की। मल्लाह ने उन्हें सन्यासी समझकर मुफ्त पदी के पार पहुंचा दिया। नदी के पार पहंुचते-पहंुचते युवा संन्यासी ने देखा कि बूढा संन्यासी चोरी-छिपे नाव में छेद कर रहा है । नाव का मल्लाह तो नदी के उस तरफ ले जा रहा है, और बूढा सन्यासी नाव में छेद कर रहा है। वह युवा संन्यासी बहुत हैरान हुआ-यह उपकार का बदला ? मुफ्त में उन्हें नदी पार करवाई जा रही है। उस गरीब मल्लाह की नाव में किया जा रहा है यह छेद ?
भूल गया शर्त को। कल रात ही शर्त तय की थी । नाव से उतरकर वे दो कदम भी आगे नहीं बढें होगें कि यूवा संन्यासी ने पूछा कि ‘सुनिये ! यह तो आश्चर्य की बात हुई कि एक संन्यासी होकर- जिस मल्लाह ने प्रेम से नदी पार करवाई है, मुफ्त सेवा की है सुबह-सुबह , उसकी नाव में छेद करने की बात मेरी समझ में नहीं आती, कि उसकी नाव में आप छेद करें ? यह कौन-सा बदला हुआ-नेकी के लिये बदी से , भलाई का बुराई से?
उस बूढे संन्यासी ने कहा , ‘शर्त तोड दी तुमने । सांझ को हमने तय किया था कि तुम पूछोगे नहीं । मेंरे से विदा हो जाओ। अगर विदा होते हो तो मैं कारण बताऐ देता हॅूं । और अगर साथ चलना हो तो आगे ध्यान रहे, दुबारा पूछा तो फिर साथ टूूट जायेगा।’
युवा सन्यासी को ख्याल आया। उसने क्षमा मांगी। उसे हैरानी हुई कि वह इतना भी संयम न रख सका, इतना भी धैर्य न रख सका। लेकिन दूसरे दिन फिर संयम टूटने की बात आ गई। वे एक जंगल से गुजर रहे थे, और उस जंगल में उस देश का सम्राट शिकार खेलने आया। उसने सन्यासियों को देखकर बहुत आदर किया, उन्हें अपने घोडो पर सवार किया और वे सब राजधानी की तरफ वापस लौटने लगे। वृद्ध सन्यासी के पास राजा ने अपने एकमात्र पुत्र युवा राजकुमार को घोडे़ पर बिठा दिया। घोडे दौड़ने लगे राजधानी की तरफ। राजा के घोडे आगे निकल गये । दोनो सन्यासियों के घोडे़ पीछे रह गये। बूढे सन्यासी के साथ राजा का बच्चा भी बैठा हुआ है, वह एकमात्र बेटा है उसका। जब वे दोनों अकेले रह गये, उस बूढे सन्यासी ने उस युवा राजकुमार की नीचे उतारा और उसके हाथ को मरोडकर तोड दिया। उसे झाडी में धक्का देकर अपने सन्यासी साथी से कहा: ‘भागो जल्दी।’
यह तो बरदाश्त के बाहर था। फिर भूल गया शर्त । उसने कहा:हैरानी की बात है यह ं।
जिस राजा ने हमारा स्वागत किया, घोडों पर सवारी दी, महलों में ठहरने का निमन्त्रण दिया- जिसपे इतना विश्वास किया, जिसने अपने बेटे के घोडे पर तुम्हें बिठाया, उसके एक मात्र बेटे का हाथ मरोडकर तुम जंगल में छोड आये हो। यह क्या है ? यह मेरी समझ के बाहर हेै। मैं इसका उत्तर चाहता हॅू।
बूढे ने का:तुमने फिर शर्त तोड दी । और मैंने कहा था कि दूसरी बार तुम शर्त तोडोगे, तो विदा हो जायेंगे। अब हम विदा हो जाते है। और दोनो का उत्त्तर मैं तूम्हेें दिेये देता हॅूं। जाओ लौटकर पता लगाओ-तुम्हें ज्ञात होगा कि वह नाव, वह मल्लाह इसी किनारे पर रात छोड गया। और रात एक गांव पर डाका डालने वाले लोग उसी नाव पर सवार होकर डाका डालेंगे । मैं उसमें छेद कर आया हॅू । एक गांव में डाका बच जाएगा ।
राजा के लड़के को मैने हाथ मरोड़कर छोड़ दिया है जंगल में । तुम पता लगाना- यह राजा अत्यन्त दुष्ट एवं कू्रर, और आततायी हैं । इसका लड़का उससे भी कू्रर और आततायी होने को हैं । लेकिन उस राज्य का एक नियम है कि गद्दी पर वही बैठ सकता है, जिसके सब अंग ठीक हो । मैंने उसका हाथ मरोड़ दिया है, वह अपंग हो गया, अब वह गद्दी पर बैठने का अधिकारी नहीं रहा । सैकड़ों वर्षो से इस देश की प्रजा पीडि़त हैं, वह पीडि़त परम्परा से मुक्त हो सकेगी ।
अब तुम विदा हो जाओ ।
मैं क्षमा चाहता हॅू ।
तुम्हें, जो प्रगट दिखाई पड़ता है, वही दिखाई पड़ता हैं; जो अप्रगट है, जो अदृश्य है, वह दिखाई नहीं पड़ता । और जो आदमी प्रगट पर ही ठहर जाता है, वह कभी सत्य की खोज नहीं कर सकता हैं । मैं तुमसे क्षमा चाहता हॅू ; हमारे रास्ते अलग जाते हैं ।


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रोग एवं उपचार का विज्ञान(अंतिम भाग)

द हीलिंग कोड़ नामक चर्चित पुस्तक एलेक्जेण्डर लाॅयड एवं बेन जाॅनसन द्वारा लिखी गयी । इसमें उपचार संहिता का विस्तृत वर्णन किया हुआ है । लेखक एलेक्जेण्डर लाॅयड अपनी पत्नि होप का ईलाज 12 वर्ष की खोज के बाद इस विधि से करने में करने में सफल रहे।साथ ही अन्य विधि भी है ।

कारण – अच्छी स्मृति अच्छे भाव पैदा करती है । तनाव जनक स्मृति तनाव पैदा करती है । स्मृति ऊर्जा सूचना तन्त्र को बनाती है । अच्छी स्मृति से बुरे भाव पिघल जाते है । अच्छी स्मृति की तस्वीरें बुरे भाव व बुरी तरंगो को समाप्त करती है । कोशिकिय स्मृति को बदल देती है । उपचार होने लगता है । जिससे डीएनए बदल जाता है । यह अचेतन स्तर पर जाकर तस्वीरें बनाती है । स्वस्थ तस्वीर विकृत तस्वीर को बदल देती है । हमारा हृदय तस्वीरों को ही देखता है । वह तस्वीरों से ही संचालित है ।
अचेतन से विनाशकारी तस्वीरें छुते हुए शरीर को चेतन मन की हानिकारक बातों की तरह नुकसान पंहुचाती है । कई लोग इस तरह स्वयं की बीमार बनाते रहते हंे ।
जब दुसरे के लिए प्रार्थना करनी हो:-
मैं प्रार्थना करता हूं कि प्रभु कृपा, विश्व पे्रम, जीवन-शक्ति एवं दिव्य प्रकाश —– मीना में —भर रहा है । उसके —-उच्च रक्तचाप—-(बीमारी) सम्बन्धी ज्ञात एवं अज्ञात नकारात्मक सोच, सम्बन्धित तस्वीरें, अस्वास्थकर विश्वास, विनाशकारी कोशिकिय स्मृतियां एवं उससे जुड़ी सभी शारीरिक समस्याओं का कारण प्रकट होता है एवं उससे उनका उपचार हो रहा है । मैं प्रार्थना करता हूं कि यह इलाज 100 गुणा से भी अधिक हो ! इस प्रार्थना का प्रभाव मीना को उपलब्ध हो !
तत्काल प्रभाव  ( Instant Impact) तकनीक:-
परिस्थितिजन्य तनाव को भगाने तत्काल प्रभाव (Instant Impact) तकनीक श्रेष्ठ है ।
1-तनाव को मापे,
2-दोनों हथेलियों को मिलाये
3-तनाव को शरीर पर देखें – शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक
4-पावर श्वसन लें – मुंह से श्वांस ले व नाक से छोड़े । समस्त श्वांस गहरी हो व नाभि तक जाएं । इस तरह का श्वसन 10 सैकण्ड में परिस्थितिजन्य तनाव घटा देता है । इसे पावर श्वसन कहते हंे ।
हृदय के भावों को खोजें:-
हृदय के भावों को पहचाने व मिटाएं-अपने दिल में छुपे भावों को पहचाने फिर उनका समाधान करें । भावों को बदलो सब बदल जाऐगा । दिल की शक्ति मस्तिष्क की शक्ति से कई गुना ज्यादा है । मुख्यतः हमारे भावों को 12 भागों में बांटा जाता है ।
1-क्षमा नहीं करना
2-हानिकारक कर्म
3-गलत धारणाएं
4-प्रेम बनाम स्वार्थ
5-खुशी बनाम अवसाद
6-शान्ति बनाम चिन्ता
7-धैर्य बनाम निराशा
8-दया बनाम कठोरता
9-अच्छाई बनाम अच्छा होना
10-विश्वास बनाम नियन्त्रण
11-विनम्रता बनाम घमण्ड
12-आत्म नियन्त्रण बनाम नियन्त्रण न होना


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रोग एवं उपचार का विज्ञान:द हीलिंग कोड़ नामक चर्चित पुस्तक से

द हीलिंग कोड़ नामक चर्चित पुस्तक एलेक्जेण्डर लाॅयड एवं बेन जाॅनसन द्वारा लिखी गयी । इसमें उपचार संहिता का विस्तृत वर्णन किया हुआ है । Healingcodeलेखक एलेक्जेण्डर लाॅयड अपनी पत्नि होप का ईलाज 12 वर्ष की खोज के बाद इस विधि से करने में करने में सफल रहे।साथ ही सात आधारभूत रहस्य बताए  है ।
रहस्य नम्बर 1- सभी रोगों का एक ही कारण होता है वह तनाव है ।
रहस्य नम्बर 2- हमारे सभी रोगों का कारण ऊर्जा समस्या है ।
रहस्य नम्बर 3- हृदय हमारे स्वस्थ होने के तन्त्र का अधिपति है ।
रहस्य नम्बर 4- मानव की हार्ड ड्राईव कोशिकीय स्मृतियां है जिसमे तस्वीरें ऊर्जा के रूप में होती है । 90 प्रतिशत तस्वीरें अचेतन में अवस्थित होती है ।
रहस्य नम्बर 5- आपका एन्टी वायरस प्रोग्राम आपको बीमार बनाता है ।
रहस्य नम्बर 6- मेरी धारणाएं ही मेरी कोशिकीय स्मृतियों को प्रभावित करती है। अवचेतन में छुपी धारणाएं स्वतः काम करती है । बीमारी की जड़ काटने तनाव गिराएं, उसे मिटाने स्मृति बदलें । रहस्य नम्बर 7- हृदय एवं मस्तिष्क में द्वन्द्व होने पर हृदय सदैव जीतता है ।
मुख्य विधि (उपचार संहिता)के चरण:-
1. तनाव को मापे – 1 से 10 के अनुपात में (10 सबसे बड़ा दर्द)
2. तनाव से जुड़ी भावनाएं व विश्वास को पहचानें
3. स्मृति में खोजें – जड़ तक जाएं – समान भाव स्थिति में कब थे
4. पूरानी स्मृति को मापे – उसका उपचार करें
5. प्रार्थना करें – उसके उपचार हेतू
मैं प्रार्थना करता हूं कि प्रभु कृपा, विश्व पे्रम, जीवन-शक्ति एवं दिव्य प्रकाश मुझमे भर रहा है । मेरे —-उच्च रक्तचाप—-(बीमारी) सम्बन्धी ज्ञात एवं अज्ञात नकारात्मक सोच, सम्बन्धित तस्वीरें, अस्वास्थकर विश्वास, विनाशकारी कोशिकिय स्मृतियां एवं उससे जुड़ी सभी शारीरिक समस्याओं का कारण प्रकट होता है एवं जिससे उनका उपचार हो रहा है । मैं प्रार्थना करता हूं कि यह इलाज 100 गुणा से भी अधिक हो !
6. चारों स्थिति में उक्त प्रार्थना – बासां पर, कनपटी पर, जबड़ों पर और कंठ के पास दोनो हाथ रख कर 30 सैंकण्ड तक दुहराएं । इससे आपके दिल के घाव भर जाते हंै । उससे बीमारी ठीक होती है ।

( to be continued…..)


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आत्मशक्ति/मस्तिष्क की क्षमता: मुनि अजितचन्द्र का महा श तावधान

जैन मुनि अजितचन्द्र सागर जी द्वारा दिनांक 04.03.2012 को मुम्बई में द्विशतावधान का प्रयोग किया गया ।

शतावधान

शतावधान

तीन हजार दर्शकों के साथ-साथ तत्कालिन विधान सभा स्पीकर श्री दिलीप पाटिल, उच्च न्यायालय के न्यायाधिश श्री कमल किशोर तातेड़ एवं न्यूरोलोजिस्ट डाॅ0 सुधीर शाह भी उपस्थित थे । दर्शकों द्वारा 200 प्रश्न व तथ्य रखे गए । जिनमे गणित के सवाल भी थे । मुनिश्री द्वारा सवालों व तथ्यों को पहले क्रमशः बताया फिर उलटा बताया गया । अन्त में लोगों ने प्रश्न क्रम बताया, उन्होने उत्तर दिया । फिर उन्होने उत्तर बताए उन्होने प्रश्न क्रम बताए । इससे हमारी आत्मा की शक्ति सिद्ध होती है ।

मुनि अजितचन्द्र ऊंझा में जन्म लिया एवं 12 वर्ष की उम्र में दिक्षा ग्रहण की । इसके बाद साढ़े छः वर्ष तक मौन रहे । उन्होने बताया कि साधना एवं ध्यान के द्वारा यह उपलब्धि प्राप्त की ।

इससे हमारी मस्तिष्क की अपार क्षमता का ज्ञान हमें होता है । हम उसका कितना प्रयोग कहां कर रहे हंै । चैतन्य-आत्मशक्ति का प्रयोग देख कर प्रेरित होने की आवश्यकता है ।

 

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कब तक गलतियों व क्षमा का क्रम चलेगा ?

प्रिय आत्मन,

 

kshama-yachna

मुझसे गलतियां हुई है। मेरी चुकें बढी है, व्यवहार में रूखा हूं, आपके प्रति कुछ अप्रिय कहा है एवं किया है। इसका खेद है। औपचारिक क्षमा नहीं, दिल पर हाथ रख कर क्षमा चाहता हूं।

अपनें अन्तर में झांकनें पर भूले स्पष्ट दिखती है, जिसकी सजा भी आप दे सकतें हो।

एक प्रश्न मन में आता है कब तक यह क्रम गलतिया करना व क्षमा मांगता रहूगा?

क्षमा प्रार्थी

जयन्ती-मीना जैन

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मातृत्व जिम्मेदारी नहीं सृजन है ,स्त्री की की अपनी तलाश है

मातृत्व आनन्ददायक है । लेकिन इससे  जिम्मेदारी बढ़ती  है । स्त्री सक्षम होती , प्रवीण होती है  इस भूमिका को निभाने में इसलिए चिन्ता की जरूरत नही है ।
Motherhood-Picassoमां बनना मात्र एक शारीरिक कृत्य से अधिक भावनात्मक कृत्य है । जैविक मां बनने मे 9 माह लगते हैं, लेकिन मातृत्व को निभाने में पूरा जीवन लगता है । जैविक मां बनने के बाद बड़ी चुनौतियां है । चुनौती का यह प्रारम्भ है ।
एक स्त्री की शादी की पूर्णता मां बन कर ही होती है । जीवन मंे सृजन मां बनने से प्रारम्भ होता है । मां का कृत्र्तव्य स्त्री को प्रतिपल सजग व सृजनशील बनाता है । स्त्रीत्व का बड़ा दर्जा मातृत्व है । वह स्वयं प्रकृति में अपनी भूमिका को पूरा करती है । इससे स्वयं के सारे अधुरेपन मिट जाते हैं । अपने शरीर के द्वारा नए शरीर को सफलता पूर्वक गढ़ना बड़ी जीत है । इसके माध्यम से स्त्री की तलाश पूरी होती है । उसके सारे अरमान साकार होते हैं ।  मां विजेता होती है । याद रखो मां मात्र  पुत्र  की नहीं होती, मातृत्व एक अवस्था है ।
तुम्हारी भूमिका बढ़ गई है । तुमसे सृष्टि अवतरित हुई है । पत्नी एवं बहु की भूमिका से बढ़ कर मां की भूमिका होती है । स्त्री को बेटी/बहन/पत्नी/बहू, से बड़ी भूमिका मां की होती है । मातृत्व स्त्री को सबसे बड़ा उपहार प्राप्त है । इसमे सामन्जस्य बेठाते हुए स्वयं को भी नहीं भूलना है । वैसे तुम स्वयं की कीमत पर दूसरों को अधिक महत्व देती रहती हो, क्या यह उचित है ? अपनी वृहतर भूमिका को सजगता से निभाओ, स्वयं तृप्त होओ व सबको भूमिकानुसार तृप्त रखो ।
पुत्र  की प्रथम शिक्षिका प्रथम रहे ! उसकी सृजनक्षमता, आत्म-सम्मान व सहजता को विकसित करंे । बच्चे को किसी रूप में विकृत न होने दे ।  पुत्र ही  उसका नहीं है । उसके आस-पास के परिजन, हवा, मिट्टी व संगी साथी भी उसका हैं । बेटे को स्वतन्त्र समझदार नागरिक बनाना । जातिवाद, पन्थवाद की परम्परा से बचाना है । लालन-पालन मां का विशेषाधिकार के साथ बड़ी जिम्मेदारी है । घ्यान रखें कि अपने पालने में हुई चुके व गलतियां उसे न भुगतनी पड़े ।

माँ ! मातृत्व को गौरवान्वित करो, उसकी सर्वोच्च सम्भावना तक पंहुचो !

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