रोग दूर करने शरीर की आन्तरिक फार्मेसी को जगाएँ

चारों ओर, यहाँ तक कि हमारे शरीर को देखने पर भी, हमें जो नजर आता है, वह आइसबर्ग का सि़र्फ ऊपरी हिस्सा है। -डाॅ. जाॅन हेजलिन
शरीर का कोई रोग उसके उभार एवं लक्षण तक सीमित नहीं होता है। वह सम्पूर्ण शरीर तन्त्र से सापेक्षित रूप से जुडा होता है। अच्छा चिकित्सा विज्ञान रोग का नहीं रोगी का उपचार करता है।
मानव-देह में कई तरह के रसायन बनाने की क्षमता है। सबसे अधिक तरह की दवाएँ बनाने वाला कारखाना धरती पर कही अन्यत्र नहीं, बल्कि हमारी देह में ही है। यहाॅ सभी प्रकार की दवाएँ समय-समय पर आवश्यकतानुसार बनायी जाती है। हमारी ग्रन्थिया के स्त्रावों से सभी आवश्यक रसायन देह में बनते हंै। दुनिया के अत्यन्त धीमें जहर भी यह देह असन्तुलन की दशा में बनाती है। हमें थकाने वाले, सताने वाले रसायन भी यह देह विकृत अवस्था में या दुरूपयोग करने पर बनाती है। देह दर्द को रोकने वाला पेनकिलर बनाती है तो दर्द पैदा करने वाला रसायन भी इसी देह में बनता है।
इस देह में सभी तरह की दवाएँ पैदा करने की क्षमता है। हम अपनी नकारात्मक सोच, असंतुलन, संदेह, विक्षोभ द्वारा हानिकारक रसायन भी पैदा कर सकते हैं तो सकारात्मक चिन्तन,समता,आस्था को उत्पन्न कर लाभप्रद दवाएँ भी पैदा कर सकते हैं।
जब हमारी प्रतिरोध शक्ति कमजोर पड़ जाती है तब देह बीमार पड़ती है। आन्तरिक असंतुलन से व्यक्ति का स्वास्थ्य नरम पड़ता है। प्राण शक्ति की कमी से मनुष्य बीमार होता है।
मानव देह ऊर्जा और प्रज्ञा का एक नेटवर्क है, न कि केवल हड्डियों का ढांचा। अर्थात हमारी देह की छोटी से छोटी ईकाइ क्वान्टम है जो कि ऊर्जा का एक कण है। इस कण में विकास व वृद्धि स्वचालित है। इस विकास व वृद्धि की सूचना ही प्रज्ञा का नेटवर्क है। रोग शरीर को अक्षुण्ण रखने वाली क्वान्टम तरंगों की संरचना में विकृतियों के फलस्वरूप होते हैं।
वातावरण ही हमारा विस्तृत शरीर है। रोगों का कारण प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से व्यक्ति स्वयं ही है।
शरीर में रोग के अनुकूल दवा बनाने की क्षमता होती है और यदि उन क्षमताओं को बिना किसी बाह्य दवा और बिना आलम्बन के विकसित कर दिया जाता है तो उपचार अधिक प्रभावशाली,स्थायी एवं भविष्य में पड़ने वाले दुष्प्रभावों से रहित होता है।

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