विश्राम क्यों जरूरी : विश्राम न कर पाने के दुष्परिणाम

विश्राम न कर पाने के कारण व्यक्ति बेहोशी में जीता है। उसकी यांत्रिकता बढती जाती है। व्यक्ति सदैव थका मांदा सा जीता है। जीवन पर विश्वास, स्वयं पर विश्वास, अस्तित्व पर विश्वास व्यस्त व्यक्ति नहीं रख पाता है। इससे आत्महीनता व अनेक ग्रन्थियों का जन्म होता है। शारीरिक ग्रन्थियां शरीर में हार्मोन्स का स्राव करती हैं। मानसिक गांठें स्नयु का संतुलन बिगाड़ती हैं। फलस्वरूप अनेक बार व्यक्ति शारीरिक व्याधियों का शिकार होता है।
थका हुआ व्यक्ति श्वास तीव्र व छोटी लेता है। श्वास में समस्वरता व स्थिरता नहीं रहती है। अतः प्रायः अस्थमा का शिकार हो जाता है। जुकाम-खांसी के प्रति संवेदनशील हो जाता है। व्यक्ति की प्रतिरोध क्षमता घट जाती है।
कुछ व्यक्ति पेट के रोगों के शिकार होते हैं। आंतें खिंची रहने से कब्जी, गैस, अपच एवं बवासीर का दुःख उठाते हैं। ढंग से विश्राम न करने वाले व्यक्ति स्वाद का शिकार होते भी देखे जा सकते हैं, जो अन्ततः पेट की बीमारियों का कारण बनते हैं।
जो व्यक्ति मानसिक रूप से मजबूत नहीं होते वे मानसिक रोगी हो जाते हैं। प्रायः सभी मनोरोगी गहरी नींद नहीं लें पाते हैं एवं मनोरोगियों की चिकित्सा का जोर रोगियों को विश्राम देना, नीेंद की दवा देना है। अवसाद व टूटन का मुख्य कारण थकान ही होता है। थकान से व्यक्ति के जीवन का संतोष समाप्त हो जाता है। व्यक्ति सदैव बैचेन रहता हैै। जिसको विश्राम करना नहीं आता है उन्हें कुछ भी अच्छा नहीं लगता है। ऐसे शख्स कुछ पाने को सदैव आतुर रहते हैं। निरन्तर कुछ पाने की आकांक्षा मानव को चैन से जीने नहीं देती है।
हम अव्यवस्थित, विश्राम के अभाव में जीते हैं। विश्राम के न होने से मनुष्य का मन स्थिर नहीं होता है। वह अनेक दिशाओं में विभाजित होता है। यही खण्ड जीवन है। टुकड़ों-टुकड़ों में जीवन जीने से जीवन जीने में व्यवस्था नहीं आती है। खण्डित मन समग्रता में नहीं जी पाता है। यही अराजकता व्यक्ति को तोड़ती है। स्वयं से दूर ले जाती है एवं व्यक्ति को थका देती है। थका हुआ व्यक्ति सब जगह परेशानी अनुभव करता है। परेशानियां कहीं से खरीदनी नहीं पड़ती है, यह अव्यवस्था से उपजती हैं। अव्यवस्थित सोच इसकी जड़ में होंती है। इस प्रकार संतुलन की कमी व्यक्ति को भावनात्मक रूप से भी तोड़ देती है। व्यक्ति का सोच सकारात्मक नहीं रहता है, जिससे उसका दृष्टिकोण नकारात्मक बन जाता है।
जीवन में टालमटोल की वृत्ति थकान का परिणाम है। थका हुआ मन कार्य से बचना चाहता है। अतः वह कार्य से बचने के बहाने खोजता है। पलायनवाद हवा से नहीं उपजता है। यह एक मनःस्थिति है जो विश्राम खोजती है। विश्राम को जानने वाला कभी भी कामचोरी नहीं करता है।

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