जीवन एक रहस्य हैः इन्द्रियों द्वारा उसे नहीं जान सकते

हमारी ज्ञानेन्द्रियों की एक सीमा होती है। हम अपनी इन्द्रियों से ही संदेश ग्रहण करते है। सभी चीजे इस शरीर द्वारा समझी नही जा सकती हैं। निराकार व सूक्ष्म इन्द्रियगोचर नही हैं। रहस्य को रहस्य रहने देना है।Invisible निराकार को जब महावीर,बुद्व न समझा सके तो उसे कोई नहीं समझा सकता है। आत्मा को, निराकार को समझना कठिन हैं। जो अगोचर है उसे इन्द्रियों द्वारा नहीं समझा जा सकता है। जो ईश्वर न बताना चाहे वह हम क्यों जानना चाहतें हो। हम स्वयं को अनुभव द्वारा ही समझ सकते है। ससिम द्वारा असीम को नहीं समझा जा सकता है। मन तर्क से परे नहीं जा सकता है।
मनोविज्ञान ,तन्त्र, मन्त्र,पराशक्तियाँ,पुनर्जन्म ,ईश्वर का अस्तित्व, आत्मा का अस्तित्व,कर्म सिद्वान्त ,प्रकृति का निमार्ण या रहस्य ,सम्बन्धो में विचित्रता अगर अज्ञात है तो उसे अज्ञात ही रहने दो। इसे समझने-समझाने के क्रम में वैसे भी सारे संगठित धर्म कर्म काण्ड बन कर रह गए है। वे कहने कुछ जाते है व अनुयायी समझते कुछ ओर हैं। सत्य इस प्रक्रिया में लुप्त हो जाता है।

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