छवियों के पीछे जीवन: टूटता मन

मीडिया ने हमारी पारम्परिक सांस्कृतिक एकता को खत्म कर दिया है । टीवी पर नामी कलाकारों के कार्यक्रम देख कर उन कलाकारों को अच्छा मान हम अपना गाना, नाचना व नाटक करना भुलते जा रहे हैं । इससे हम सृजनशील रहते व मस्ती लुटते थे । आज टीवी, कम्प्यूटर पर इनको देख कर निष्क्रीय व निठल्ले होते जा रहे हैं । कर्ता से हम देखने वाले होते जा रहे हैं । इससे भावनात्मक विकास व लगाव कम हो गया है व हम एकाकी होते जा रहे हैं । दूसरों को श्रेष्ठ मानने से स्वयं हीन भावना बढ़ा रहे हैं । image
टीवी/इन्टरनेट ने एक काल्पनिक दुनिया रच दी है । जिसमे व्यक्ति जीते हुए वास्तव में स्वयं से पलायन करता है । उसका मन एक काल्पनिक दुनिया में विचरण करता है । तब वह वास्तविक दुनिया से कट जाता है । काल्पनिक जगतवत् वह व्यवहार अपनों से करता है व वैसी प्रतिक्रिया की आशा करता है । जब उसे इस अनुरूप आचरण नहीं मिलता है तो वह निराश हो जाता है । इस प्रकार अपनों से दूर होता जाता है । वास्तविक जगत उसे कचोटने लगता है । काल्पनिक जगत ओर रूचिकर लगता जाता है । सितारे नायक बन जाते हैं । इस तरह यथार्थ से कटना अवसाद को बढ़ाता है । व्यक्ति को अकेला कर देता है व तनावग्रस्त रहता है ।
टीवी में दिखाये जाने वाले नारी/पुरूष वास्तव में वैसे नहीं होते हैं । उनकी ग्लेमरस व मेचों छवि निर्मित होती है । इसे बनाने में तकनीकी, मशीनों व ढेर सारे व्यक्तियों की भूमिका होती है । वह छवि वास्तविक नहीं होती है । इसमे उनकी मात्र अदाकारी होती है । वास्तविक जीवन में दूर-दूर तक भी वैसे वे नही हो सकते हैं न ही होते हैं । हमारे मनोरंजन या कोई उत्पादन बेचने वैसी छवि जानबुझ कर प्रस्तुत की जाती है ताकि हम उसे वैसा माने । उस मोहक छवि को हम मन में बसा कर जीवन में खोजते हैं, जो कहीं हो नहीं सकती है तब न मिलने पर उदास होते हैं ।
मीडिया से हम थोड़ा बहुत मनोरंजन पाते हैं लेकिन छवियां मन में बैठाने से कहीं अकेले पड़ जाते हैं । टीवी देखने से सम्बन्ध उपेक्षित होते जा रहे हैं । सम्बन्धों मंे संवाद की कमी होती जा रही है । सूचनात्मक सवांद तो मोबाईल से बढ़ा है लेकिन भावनात्मक लगाव परस्पर घटते जा रहे हैं । नए मूल्य अनुसार भावनाओं को कमजोरी माना जाता है । सम्बन्धियों व मित्रों के घर जाना कम हो गया है व वहां जाने पर भी कई बार सब टीवी देखने लगते हैं । स्वयं की निगाह में कमतर मिलने पर टुटते हैं । अंततोगत्वा हमें यह निष्क्रिय मनोरंजन छोटा भी बना देता है ।
हमारे पूर्वज जीवन भर में जितनी सुन्दर स्त्रियां नहीं देखते थे, उससे ज्यादा हम एक दिन में टीवी पर देखते हैं । इस तरह सुन्दरता का भूत खड़ा किया जाता है । इससे दर्शक भटक जाता है । वैसी छवियां/सुन्दरता जीवन में खोजता है । इस तरह व्यक्ति असंतुष्ट हो जाता है एवं नारी हीन भावना की शिकार होती है । टीवी पर आने वाले तीन चैथाई कार्यक्रमों में अप्रत्यक्ष रूप से सेक्सूलिटी/कामवासना बढ़ाने वाले होते हैे । नारी सौन्दर्य का मादक बना कर दिखाया जाता है । बच्चे इन्हे देख कर शीघ्र्र अवांछित सीख जाते हैं । आज सेक्सुलिटी की बाढ़ टीवी की देन है । दिन भर इस तरह के कार्यक्रमों को देखने से भला चंगा व्यक्ति भ्रष्ट हो जाता है।
टीवी से मधुमेह, मोटापा व हृदय रोग होते हैं । एक शोध केे अनुसार एक घंटा टीवी देखने से 22 मिनट उम्र घटती है । टीवी देखने से बच्चों की आंखे कमजोर होती है इससे उन्हे चश्मा पहनना पड़ता है । टीवी मनोरंजन कम व हमे भटकाता ज्यादा है । मन को बेलगाम यह करता है । मन को अस्थिर यह करता है। उसे गहरे कुएं मे यह धकेलता है । अतृप्त यह करता है । निराशा व बेचैनी यह फैलाता है। सपने यह दिखाता है । दिन में तारे यह दिखाता है । टीवी अशान्ति का डिब्बा है । इसे बुद्धु बक्सा वैसे ही नहीं कहते हैं ? हम इससे सपने खरीदते हैं । छवियां ग्रहण करते हैं । यथार्थ से दूर होते हैं ।

बच्चों को पंख देता है, साथ ही काट भी डालता है । नन्हे मन को युवा बना देता है । डायलाॅगबाजी सीखा देता है । बच्चों मे भेद भूला देता है । बच्चे को शैतान बनाता है । नए तरह के अन्धविश्वास सीखाता है । यथार्थ से दूर करता है । एक काल्पनिक जगत में जीना सीखाता है ।
टीवी कैसे घर वालों को बेघर बनाता है । यह घर में आग लगाता है । दर्शकों को भटकाता है । भेजा खराब करता है । सम्बन्धों को विकृत करता है । अपनों में दूरी पैदा करता है ।

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