मुद्रा अर्थव्यवस्था बनाम पवित्र अर्थशास्त्र का प्रणेता चाल्र्स आईन्सटीन

मुद्रा अर्थव्यवस्था म्यूजिकल कुर्सी दौड़ की तरह है जिसमे अभ्यर्थी 60 है व कुर्सीयां 55 होती है । इसमें ज्योंहि म्यूजिक बन्द होता है तब कुर्सियों पर बैठने हेतु प्रतिस्पद्र्धा होती है । संख्या कम होने का भाव रहता है । कमी का बोध छिना झपटी को प्रेरित करता है । इसी भाव से मनुष्य अकेला होता जाता है, मन में स्वयं से दूर होता है । समाज से दूर हो जाता है । GiftEconomy
सृष्टि में सबके लिए पर्याप्त है । सब का काम चल सकता है । इसी बोध से अर्थशास्त्र पवित्र हो जाता है । सब इस पर भरोसा न कर पाने केे लिए संघर्ष करते हैं । तब संघर्ष प्रधान अर्थशास्त्र प्रधान हो जाता है ।
यह मुद्रा अर्थशास्त्र विज्ञान के साथ मिल कर उद्योग प्रधान हो गया है । इससे कृषि जमीन कम होती जा रही व उद्योग बढ़ रहे हैं । उद्योग बेरोजगारी व नियन्त्रण बढ़ा रहे हैं । अमीर-गरीब के बीच खाई बढ़ रही है । तकनीकी विकास ने इन्सान को मशीन बना दिया है जिससे सम्बन्ध टूटते जा रहे हैं । मानवता, दया, प्यार, भाईचारा कम होता जा रहा है ।
संक्रमण में जब सब कुछ बदल रहा है । मुद्रा, उपहार एवं संव्यवहार की बदलती प्रकृति सबको बदल सकती है । मुद्रा के संव्यवहार ने सबको बांटा है तो उपहार के संव्यवहार सबको जोड़ भी सकते हैं ।
चमत्कार अभी भी हो सकते हैं । उसकी झलके शिक्षान्तर, स्वराज, दरिया दिल दुकान, उपहार-संस्कृति में देखी जा सकती है । यहां पर पानी को सिर्फ पानी या एच2ओ न मान कर जल देवता माना जाता है । यह भारतीय संस्कृति की बड़ी विशषता है जो मानवता को सही राह दिखा सकती है ।
मुद्रा अर्थव्यवस्था ने हममे अलगाव, संघर्ष एवं कमी अभाव को बढ़ाया है, आपसी सामजंस्य को तोड़ा है एवं अन्तहीन उन्नति का सपना दिखाया है । प्रतिस्पद्र्धा व सफलता के युग में ठहराव शान्ति पवित्र अर्थशास्त्र से सम्भव है ।  r

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