अन्तर्जगत के सिकन्दर कैसे बनना ?

जीवन मंे बहुत कुछ हमारे भीतर पर आधारित है । हमारा बाह्य जीवन अन्तर्जगत से ही जन्म लेता है । सबके बीज़ हमारे प्रारम्भ से ही विद्यमान होते हैं । धर्म की भाषा में इस बीज़ को कारण शरीर कहते हैं । इसी मे से सूक्ष्म शरीर प्रकट होता है । सूक्ष्म शरीर ही स्थूल शरीर को बनाता है । अर्थात् हम जो कुछ हैं, जैसे हैं – वह सब अपनी आन्तरिक व्यवस्था के कारण है । हम अन्दर की प्रकृति, भाव व सोच से निर्मित होते व जीते हैं । बाहर तो तद्नुरूप व्यवस्था अन्तर्शक्ति जुटाती है या प्रकट करती है । हमारा सारे व्यवहार की जड़ हमारे मन में होती है । जैसा अन्दर होता है वही बाहर खिलता है । जैसे कि बीज के अन्दर ही पेड़ छिपा होता है । जो जिन्स इसके लिए जिम्मेदार है व सब बीज मे अन्तर्निहीत होते हैं ।subtle body
बाहर का सिकन्दर बहुत शीघ्र धुल धुसरित हो जाता है । एक मच्छर उसको निपटा देता है । सिकन्दर मलेरिया से मर जाता है । लेकिन भीतर का सिकन्दर स्थायी होता है । उसे कोई बाह्य कारक चुनौती नहीं दे सकता है । वह अपने भीतर से जीता है । समाज, पड़ौसी, प्रतिष्ठा, भय के कारण वह समझौते नहीं करता है। सुकरात को जहर पीने से बचने व भागने का समय मिला था, लेकिन वह बचना नहीं चाहते हैं । वह सजगता से जहर पीते हैं । क्योंकि वे भीतर से सिकन्दर थे । स्वविजेता थे । किसी दूसरे पर किसी तरह से निर्भर नहीं थे । अपनी जिम्मेदारी पर जीते हैं । किसी अन्य को दोष नहीं देते हैं एवं किसी को दुश्मन नहीं मानते हैं। सब को सहकारी मानते हैं व स्वयं की पूर्णता में जीते हैं । कहीं से अधुरापन/अपूर्णता नहीं है । स्वयं की पूर्णता को जानते, मानते व जीते हैं । बाहर की यात्रा खेल भाव में करते हैं । जल में कमलवत निर्लिप्त रहते हैं ।
चीन में लाओत्से को तत्कालीन सम्राट अपना प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे । उन्होने पद स्वीकारने से मना कर दिया । कहा कि जब केचुंआ सोने के पींजरे में रहने को तैयार नहीं होता है तो वह उससे कम बुद्धि वाले नहीं है । अपने स्वभाव में जीना सबको प्रिय है । फिर वह पद, मद एवं धन के कारण अपना बुनियादी कुदरत नहीं त्याग सकते हैं । अतः उन्होने क्षमा मांग ली । उन्होने अपनी स्वतन्त्रता लोभवश नहीं खोई ।
बाहरी चकाचैंध के कारण स्वत्व को भूलना उचित नहीं है । पदार्थ को पाने परमात्मा को नहीं छोड़ा जा सकता है । साकार को पाने निराकार को, अस्थायी को पाने नित्य स्थायी को अन्दर के सिकन्दर नहीं भूलते हैं। अपने स्वभाव को भूलना इन्हे मंजूर नहीं है । पर को पाने एवं जीतने के क्रम में स्व को विस्मृत करने पर सब कुछ खो जाता है । बाहर तो कुछ मिलता नहीं, प्यास बुझती नहीं, अतृप्ति बढ़ती जाती है । ऐसी बाहरी यात्रा भीतर के बादशाह नहीं करते हैं ।
बाहर से शंहशाह वहीं बनना चाहते हैं जो अन्दर से दरिद्र होते हैं । जिन्हें अपने भीतर के खजानों का बोध नहीं होता है । इसलिए बाहर की वस्तुओं से स्वयं को भरना चाहते हैं ।
कबीरदास जी ने सटीक लिखा है:
सबके पलते लाल, लाल बिना कोई नहीं ।
ये तो भया कंगाल गांठ खोल देखी नहीं ।।
हम अपूर्ण अपनी सोच के कारण हैं । अधुरापन अपने अज्ञान से है ।
इस हेतु सर्वप्रथम अपने पास आना पड़ता है । अभी तक जो बाहर का महत्व दे रखा है उसकी बजाय अन्दर को प्राथमिक बनाना पड़ता है ।

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