रोगों का असली कारण अचेतन में होता है

इस प्रगतिक्रम मंे उतरते-उतरते इन दिनों आरोग्यशास्त्र के क्षेत्र मंे इस तथ्य को खोज निकाला गया है कि शारीरिक रोगों के सन्दर्भ मंे आहार-विहार, विषाणु आक्रमण आदि को तो बहुत ही स्वल्प मात्रा में दोषी ठहराया जा सकता है। रुग्णता का असली कारण व्यक्ति की मनःस्थिति है।
सुविख्यात मनःशास्त्री एच. एलेनवर्गर के शोधग्रन्थ ‘‘ए हिस्ट्री आॅफ डायनिमक साइकियाट्री’’ के अनुसार शरीर की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष क्रियाओं पर पूरी तरह मानसिक अनुशासन ही काम करता है।
यह मोटा निष्कर्ष हुआ। बारीकी मंे उतरने पर पता चलता है कि अमुक शारीरिक लोग अमुक मनोविकार के फलस्वरूप उत्पन्न होते हैं और वे तब तक बने ही रहते हैं जब तक कि मानसिक स्थिति मंे कारगर परिवर्तन न हो।
आहार-विहारजन्य साधारण रोग तो शरीर की निरोधक जीवनी शक्ति ही अच्छी करती रहती है। उसी का श्रेय चिकित्सकों को मिल जाता है। सच्चाई तो यह है कि एक भी छोटे या बड़े रोग का शर्तिया इलाज अभी तक संसार के किसी भी कोने में, किसी भी चिकित्सक के हाथ नहीं लगा है। कोई भी औषधि अपने आश्वासन को पूरा कर सकने में सफल नहीं हुई है। अँधेरे मंे ढेले फेंकने जैसे प्रयास ही चिकित्सा क्षेत्र में चलते रहते हैं।
शरीर शास्त्री भी अब इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि आरोग्य और रुग्णता की कुंजी मनःक्षेत्र में सुरक्षित है। अब क्रमशः औषधि उपचार का महत्त्व घटता जा रहा है और मानसोपचार को प्रमुखता दी जा रही है।
मानव मन के विशेषज्ञ एरिके फ्राम के गं्रथ ‘‘मैंन फार हिमसेल्फ’’ के अनुसार मानसिक विकृतियों में से सामयिक उलझनों के कारण तो बहुत थोड़े से होते है।अधिकतर उनका कारण नैतिक होता है। भीतर दो व्यक्तित्व उत्पन्न हो जाते है और जिनमें निरन्तर संघर्ष चलता रहता है। फलस्वरूप रोग खड़े हो जाते है।
मनीषी एल. के फ्रैंक के ग्रंथ ‘‘सोशल एनालिसिस’’ के अनुसार विक्षिप्त, अर्ध-विक्षिप्त और विक्षिप्ता के सन्निकट सनकी लोगों से प्रायः आधा समाज भरा पड़ा है। यमलोक के अधिपति चित्रगुप्त को अचेतन मन ही समझा जाना चाहिए। उनका कार्य क्षेत्र यमलोक वह मन संस्थान जिसमें प्रतिफल को परिणत कर सकने की ईश्वर प्रदत क्षमता मौजूद है। यम, नियमन व्यवस्था एवं अनुशासन को कहते है। मस्तिष्क को यमलोक और उसकी मूलभूत सत्ता को , चित्त को चित्रगुप्त की संज्ञा देकर शास्त्रकारों ने सही चित्रण किया है। ईश्वर ने सर्वत्र स्व संचालित पद्वति रखी है।ताकि न्याय व्यवस्था अगल से न करनी पड़ी।

2 विचार “रोगों का असली कारण अचेतन में होता है&rdquo पर;

  1. सच्चाई तो यह है कि एक भी छोटे या बड़े रोग का शर्तिया इलाज अभी तक संसार के किसी भी कोने में, किसी भी चिकित्सक के हाथ नहीं लगा है। कोई भी औषधि अपने आश्वासन को पूरा कर सकने में सफल नहीं हुई है। अँधेरे में ढेले फेंकने जैसे प्रयास ही चिकित्सा क्षेत्र में चलते रहते हैं।
    ..बहुत सही जागरूक प्रस्तुति

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