हमारी हानि आलोचना से कैसे होती है ?

दूसरों के दोषों की चर्चा करना, दोषों को ध्यान में रखना आलोचना करना है ।criticise हम आलोचना करते वक्त अपना समय व ऊर्जा बेकार करते हैं । बुराई करना नकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाना है । बुराई करते वक्त हम अपनी प्रसन्नता व आशा तोड़ते हैं । दूसरों की आलोचना हमें स्वयं से स्वयं को दूर करती है । इसमे हम अनावश्यक भटक जाते हैं । दूसरों केे गुण-दोषों की समीक्षा कर उसका महत्व बढ़ाना है ।
आलोचना ईष्र्या से भी की जाती है ं आलोचना का क्रम तुलनात्मकता को बढ़ाता है । तुलना करने पर अहं बढ़ता या घटता है । तुलना सहज स्वीकृति के विरूद्ध है । इससे अशान्ति बढ़ती है ।
दूसरों की बुराई करने में जो रस आता है वह हमारे मन व शरीर को दूषित करता है । यह दूषण आत्म विनाशक है । आलोचना करने से झगड़ा भी हो सकता है । यह हमारी नकारात्मकता को बढ़ाता है । दूसरों को अनुपस्थिति में दोष देना हमारे अहंकार का पोषण है ।
आलोचना करने पर गठिया होता है ।

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