बातचीत में निर्णय नहीं सुनाए, प्रस्ताव रखें:जीवन विद्या

जीवन विद्या के इस सूत्र ने मुझे बहुत प्रभावित किया है । जीवन में फैसले न सुनाएं । अपना मत प्रस्तुत न कर अपनी बात प्रस्ताव के रूप में रखें । हमें आदेश नहीं पारित करने है । आपसी बातचीत में निर्णय न सुनाएं । निर्णय सुनाने से अहं बढ़ता है । हर वस्तु के बहुत आयाम होते हैं । सामान्यतः सभी आयामों को ध्यान में रख कर बात नहीं करते हैं । इसलिए फैसले न करें । अपनी बात को प्रस्ताव के रूप में पेश करें व मापने के लिए दूसरों को स्वतन्त्र करें । उनकी समझ पर भरोसा करें व उन्हंे अपने निर्णय करने दे ।
सदैव निर्णयात्मक होने की आवश्यकता नहीं है । हमारी जानकारी ही सीमित नहीं है बल्कि जानने का साधन मस्तिष्क की भी एक सीमा है । अतः किसी व्यक्ति, घटना, तथ्य, शास्त्र, धर्म, परम्परा, सम्प्रदाय, समुदाय के बारे में निर्णयक बात न करें ।
उद्देश्य के विचारार्थ अपनी बात तर्कपूर्ण ढंग से रखें । अपने विचार थोपने का प्रयत्न न करें । दूसरों की अपनी आजादी है । उसका सम्मान करें । सत्य अन्यथा भी हो सकता है । अपनी बात ही सही हो इसकी कोई गारन्टी नहीं है।
बात को प्रस्ताव के रूप में रखने से संवाद करने में सुविधा हो जाती है । सुनने वाले को पूरा महत्व मिलता है । इससे संवाद एक तरफ नहीं रहता है। इससे संवाद कौशल बढ़ता है । आलोचना करने से भी बच जाते हैं । संवाद नकारात्मक नही रहता है ।

बातचीत में निर्णय नहीं सुनाए, प्रस्ताव रखें:जीवन विद्या&rdquo पर एक विचार;

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