पूर्वाग्रह व निष्पक्ष तार्किकता को दर्शाती फिल्म ‘एक रूका हुआ फैसला’

अपने परिवार में निर्णय कैसे करने चाहिए । आपसी सदस्यों को कैसे समझाना । सामुहिक संवाद से निर्णय करने की कला इससे सीख सकते हैं ।यह दर्शाती है कि हम कैसे फैसले लेते हंै ? यह मानना छोड़ जांचना सिखाती है । फैसला करने के दौरान व्यक्तिगत मान्यता कैसे प्रभावित करती है ऐसा दिखाया गया है । Ek_Ruka_Hua_Faisla
‘एक रूका हुआ फैसला’ नामक हिन्दी फिल्म देखी जिससे निर्णय प्रवृति जांचने मिली कि कैसे हम अपने स्वार्थवश या अज्ञानवश जल्दबाजी में निर्णय करते हंै । अपनी-2 मान्यता के आधार पर सोचते हैं। यह बड़ा घातक है । इसमे दिखाया गया है कि धिरे-धिेरे संवाद से कैसे मान्यताएं बदलती है जिससे निर्णय बदलता जाता है ।
फिल्म में एक व्यक्ति पर आरोप है कि उसने अपने पिताजी का खुन कर दिया है। कोर्ट में गवाही हो चुकी है अब जुरी को यह निर्णय करना है कि वह कसुरवार है कि नहीं । फिल्म के प्रारम्भ में जूरी के ग्यारह सदस्य आरोपी को कसुरवार मानते हैं । मात्र एक सदस्य आरोपी पर संदेह कर अपनी बात रखता है। लेकिन फिल्म का नायक रैना अपना संतुलन नहीं खोते हुए विनम्रतापूर्वक दृढ़ता से अपनी बात रखता है कि शायद वह बेकसुर है । इस जब यह स्पष्ट होने लगता है कि यह एक जिन्दगी का सवाल है। इससे फिल्म आगे बढ़ती है। गवाही का सूक्ष्म परीक्षण होने लगता है। दूसरे जुरी के सदस्य भी अपने निर्णय पर पुर्नविचार करने लगते है। अपने पुर्वाग्रहांे को पहचानते हुए अपना निर्णय बदलने लगते हैं। अपने निर्णय के आधारों पर उन्हे शक होने लगता है। जल्दबाजी व अपनी लापरवाही दिखने लगती है। जो पहले वैसे ही मान लेते हैं वे अब अपने निर्णय को जांचने लगते है कि उन्होने मात्र किसी आवेश या मान्यतावश तो निर्णय नहीं कर लिया । इस क्रम मे जुरी के सभी सदस्य आपस में टकराते है एवं व्यक्तिगत आरोप भी लगाते हैं।सभी सदस्य धिरे-धिरे बदल कर उसे बेकसुर मानने लगते हैं । अन्त में सभी सदस्य आरोपी को बेगुनाह मानते हैं।
तर्क द्वारा शान्ति से अपनी बात खुले मन से करने पर सच्चाई की दिशा में प्रयत्न किए जा सकते हंै । किसी के साथ अपने पूर्वाग्रहों व अनुकरण के कारण अन्याय न करें । मनुष्य एवं मनुष्य के बीच सम्बन्ध न्याय पर ही टिके हुए हैं । अतः व्यवहार बढ़ाना है तो न्याय पर ध्यान देना चाहिए । निर्णय मान्यता के आधार पर नहीं लेकर जानकर लेने चाहिए ।

अंग्रेजी फिल्म ‘‘टवेल्व एन्ग्री मेन’’ से प्रेरित है । यह नाम ज्यादा सार्थक है । जुरी के सभी सदस्य क्षुब्ध व खफा है, गुस्से में है । उसका असर उनके निर्णयों पर आता है । जल्दबाजी के कारण व गम्भीरता से न तो सुनते हैं न ही तय करते है । किसी न किसी आवेश में बस तय कर लेते हैं । जबकि तय करने का कोई स्पष्ट ठोस तार्किक कारण उनके पास नहीं होता है। एक सदस्य को वहां से जरूरी जाना है इसलिए उसे कसूरवार मान कर भागना चाहता है । एक सदस्य सोचता है कि पुलिस ने पकड़ा है, चश्मदीद गवाह है । बस कसूरवार है । एक मानता है कि अधिकांश कसूरवार मान रहे हैं तो ठीक ही मानते होगें तो वह कसूरवार कह देता है । एक नया सदस्य है अधिक विचार न कर बहुमत का साथ देता है । बूढ़े सदस्य पूरा विश्लेषण न कर हां कर देते हैं । तार्किक सदस्य चश्मदीद गवाही व आरोपी की अपराधिक प्रवृति के कारण सजा देना चाहता है ।एक सदस्य निम्न जाति का होने से उसे अपराधी मान लेते हैं । सभी अलग-अलग अपने-अपने कारणों के आधार पर गुनहगार मानते हैं । फिल्म में पंकजकपूर व रैना की एक्टिंग बहुत ही सटीक है । पंकजकपूर का बेटा झगड़ा कर घर छोड़कर चला गया है इसलिए वह सभी बेटों को अपराधी मान लेता है कि बेटे दुष्ट ही होते हैं । वह अपने पुर्वाग्रह के कारण उसे कसुरवार मानते हैं। भावुक पंकज कपूर सारे बेेटों को गुनहगार मानने के कारण सजा देना चाहता है।
संतुलित सदस्य नायक शान्ति से विचार कर निर्णय चाहता है चूंकि उसे गुनहगार होने में संदेह है । माकूल शक का वह निराकरण चाहता है । नायक का कहना है कि चर्चा जारी रहनी चाहिए ताकि निर्णय लेने मे सुविधा हो ।
निर्णय के क्रम में व्यक्तिगत आरोप लगाते हैं एवं परस्पर झगड़ने लगते हैं । अपने-अपने भीतर की कूंठाए व पूर्वाग्रह को अच्छी तरह से दिखाया गया है । क्षेत्र, ऊंच-नीच, तेरा-मेरा बीच में आते है । जबकि उपराध स्वतन्त्र कर्म है, कोई भी भ्रष्ट नहीं है व ईमान से निर्णय करने आए हैं । किसी का निजी हित आरोपी से नहीं है । लेकिन स्वयं के आग्रह हावी है । दर्शक स्वयं अपना निर्णय बदलते जाते हैं व पूरी प्रक्रिया स्पष्टता से जांचने का महत्व समझने लगता है । बिना आधार व कारण के भी गलत निर्णय होता है । हम निरपेक्ष नहीं देखते हैं । देखने में आन्तरिक कारण होते हैं ।

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