प्रेम मंे छिपा है द्वंद्व एवं द्वंद्व मे छिपा है अद्वैत का छंद

वेलेन्टाइन दिवस पर प्रेम का गहन विश्लेषण करता कहानीकार एवं प्रेम खोजी हिमालयी यायावर सैन्नी अशेष का प्रेम और मैत्री नामक लेख ‘‘अहा ! जिंदगी’’ के फरवरी 2014 के अंक में छपा है । इसमे लेखक ने प्रेम के सभी स्वरूपों को तलाशते हुए लिखा है कि आज स्त्री-पुरूष दोनों प्यार में होते हुए भी उसी को तलाशते नजर आते हैं… कहीं संतुष्टि नहीं है तो कहीं रजामंदी नहीं है । इस तरह का द्वन्द्व सबमे है । इस दुविधा से पार पाने की लेखक ने कला निम्न बताई है ।
प्रेम क्या है ?
‘ब्रह्मांड अपनी असीमाओं का दीवाना है । निराकार को आकार देने के उसके अपने दो धर्म है: परस्पर विरोधी ध्रुव, नेगेटिव और पाॅजिटिव ! उनके मिलन से वह स्वयं को सुंदरतर करता आया है। विपरित ध्रुव के मिलन से नवजीवन की रचना होती है।उन दोनों की आपसी कशिश ही सारी दोस्तियों और सारी मुहब्बतों को नए आकाश देती है।द्वंद्वो का स्वीकार ही दो दीयांे को अभिन्न लपट बना सकता है ।’
अस्तित्वगत चेतना ने मानव आत्मओं का नारी और पुरूष में विभाजन गहरे अर्थ से किया है । दोनों में यदि दोनों मौजूद न होते तो एक-दूसरे की खोज में वे इतने दीवाने न होते । अपने संबंधो के उपरले स्तर की उत्तेजना से मुक्त हो जाने के बाद ही वे तन और मन के आत्मिक स्पर्श तक पंहुचते हैं ।’
पाखण्ड क्या है ?
‘स्त्री-पुरूष के पारस्परिक प्रेम और निकटताओं में छिपे हुए परमावश्यक पोषण से आज का पुरूष वर्ग लगभग पूर्णतया वंचित है, क्यांेकि इस संपर्क की पुरी पट्टिका को उसने अपने पशु की मांसल भूख से दूषित कर रखा है । आज कई स्त्रियां पुरूष को हराने के लिए उसी के जैसा कुटिल मार्ग चुनने लगी है ।
‘‘ज्यों ही हम मूल स्वभाव की अनदेखी करके नियमों या नैतिकताओं का विधान बनाते है, हमारे रिश्तों और संपर्कों में भयपूर्ण ढोंग समा जाता है, जिसे हम सभ्यता या संस्कृति तक कह डालते हैं ।’’ अपने अद्र्धांग के प्रेम से बचते हुए आराम से समलिंगी हो जाना या सुविधा से शादीशुदा होकर जीवन सुरक्षित कर लेना जीना नहीं है। उथला प्रेम अतृप्त करता है ।
स्त्री और पुरूष का बाहरी द्वंद्व और भीतर छिपी हुई अभिन्नता
‘स्त्री और पुरूष एक-दूसरे के प्रेम में पड़े बिना सुरक्षित कितने भी हो जाए, वे एक-दूसरे के साथ अपने अनुभवों को जाने और जिये बिना ‘ग्रो’ कर ही नहीं सकते । पारस्परिक द्वंद्वो में पड़े बिना वे न स्वयं को जान सकते हैं, न पा सकते हैं । वे एक-दूसरे का खोया हुआ हिस्सा है, जिसे खोजे और स्वयं में सहेजे बिना वे नपुंसक है । दुनिया की सबसे बढ़ी चुनौती है एक पुरूष का अपने तल की स्त्री को खोजना और एक स्त्री का अपने पुरूष को पा लेना ।’
वह न भी मिले तो भी यह खोज बहुत रचनात्मक और बहुत संगीतमय हो जाती है। हम सब का अवचेतन विपरित लिंग का होता है । पुरूष स्थूल शरीर, पुरूष का चेतन मन व उसका सूक्ष्म शरीर अवचेतन स्त्री का होता है । इसी तरह स्त्री देह में अवचेतन पुरूष का होता है । इसी में पुरूष के भीतर एक स्त्री और एक स्त्री के भीतर एक पुरूष अंगड़ाई लेता है ।
‘अपने प्रिय के विचारों और रूचियों को समझकर उनमे सहमंथन करना, स्वीकृति और अस्वीकृति देने का साहस रखना, सुख-दुख में साथ खड़े होना और अपनी भी रूचि-अरूचि प्रकट कर देना प्रेम और मैत्री के उच्चतर पड़ाव है । प्रेम की खोज विपरित लिंग के साथ रह कर, समझ कर, लड़ते हुए, द्वन्द्व को झेलते हुए स्वयं के भीतर अवचेतन से मिलन होता है । वही पूर्णता है । अपने को जानना व सत्य का साक्षात्कार है । जीवन से तृप्त होना है ।अपनी बंूद को सागर में मिलाते हुए स्वयं सागर होना है ।
ज्यों-ज्यों प्रेम उमड़ता है, प्रियजनों के बीच शब्द उतने नहीं रह जाते, जितनी कि पारस्परिक तरंगे ऊर्जामय हो उठती है । एक सच्चा मीत जब अचानक हमारा हाथ पकड़ता है, तो हम नवजीवन से झनझना उठते हैं । यह विपरीत धु्रवों से पूर्ण होने वाला अद्भुत सर्किट है ।’

( courtsey Aha! Zindagi  and Sainny Ashesh)

पुरा लेख हाजिर है ।

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