जीवन विद्या शिविर :स्वयं को जांचने व मापने की कला सीखी

मैने गत माह स्वराज यूनिवर्सिटी  द्वारा आयोजित  जीवन विद्या के शिविर में भाग लिया ।बाबा नागराज   द्वारा रचित जीवन विद्या शिविर के    विनिश गुप्ता   प्रबोधक थे  । मैं स्वयं क्या हुं, मेरा शरीर के साथ क्या रिश्ता है, शरीर की मांगे क्या है, परिवार किसे कहते हैं, समाज व प्रकृति से जुड़ाव मेरा कितना है व सह-अस्तित्व मंे कैसे जीना आदि मूल प्रश्नों पर मंथन करने मिला । सही समझ क्या है व इसको कैसे जीवन मंे प्रयोग लाना पर संवाद किया ।इसको मध्यस्थ दर्शन  भी कहते  है ।Tapowan, Udaipur
आधार बिन्दु
शिविर के आधार बिन्दु बहुत महत्वपूर्ण है । प्रबोधक कभी भी अपने विचार, दर्शन, ज्ञान व अनुभव नहीं थोपता है । अपनी बात को वह प्रस्ताव बताते हंै कि संभागी उसे जांचे । आपकी सहज स्वीकृति है या नहीं । अर्थात बिना यदि परन्तु के उसे मानते हैं । प्रबोधक को संभागी की सहमति नहीं चाहिए । दूसरा आधार बिन्दु शब्द पर न जाए, उसके अर्थ पर जाए । शब्द मात्र संकेतक है । अर्थात शब्दों मंे न उलझे । विपरित, दूरवर्ति या काल्पनिक अपने पूर्वाग्रह के आधार पर अर्थ न लगाए ।
इस शिविर में अन्य किसी की बात न करंे मात्र अपनी बात करें । ताकि विषयान्तर न हो व विस्तृत (डिटेलिंग) होने से बचे ।

यह स्वयं में, स्वयं की शोध की प्रक्रिया है, स्वयं को समझने एवं स्वयं के विकास की प्रक्रिया है ।हम दूसरों जैसे नही अपने जैसे बने । हम अपनी सोच-विचार अनुसार बनते जाते हैं । सोच का आधार मान्यताएं है । इन मान्यताओं को देख कर इनका परीक्षण करने की जरूरत है । स्वयं का निरीक्षण, परीक्षण कैसे करना सीखा । अभी तक जो सिखा हुआ है उसका आंकलन करने की कला सीखी ।
यह मौलिक प्रश्नों को खड़ा करती है । मुलभूत प्रश्नों के समाधान खोजती है । तत्काल कोई राहत नहीं देती है । यह वेल्यू लेब व फोरम से भिन्न है ।
यहां दिन भर अपने पर कार्य करने मिला । स्वयं की सोच व कृत्यों का अवलोकन हुआ कि मेरे भीतर क्या सोच चल रहा है । उस सोच को रोकना है । सोच के बहाव में नहीं बहना है । रूक कर देखा तो सुविधा से ही सब कुछ नहीं मिल सकता का भास हुआ । सम्बन्धों की तरफ ध्यान गया व उनका महत्व समझ में आया । अपनी भौतिक उन्नति ही विकास/सफलता नहीं है । यह साफ-साफ देखने मिला ।
अपने वैभव को प्राप्त करना है तो स्वयं को समझना होगा । ईमानदारी से जिम्मेदारी लेकर अपनी भागीदारी खोज कर ही स्वराज भोगा जा सकता है । स्वतन्त्र होने इतना तो करना ही पड़ेगा । अन्ततोगत्वा विधि, तकनीक, योग कार्य नहीं आते हैं । स्वयं का जागरण ही उपादेय है ।                                                  (to be continued….)

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4 विचार “जीवन विद्या शिविर :स्वयं को जांचने व मापने की कला सीखी&rdquo पर;

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