अनुत्तर योगी तीर्थंकर महावीर :वीरेन्द्रकुमार जैन रचित प्रसिद्ध उपन्यास

हिन्दी भाषा में लिखा हुआ एक महानतम् उपन्यास है, जिसको पढ़ने पर महाकाव्य का रस आता है । पहले भाग में महावीर की गृह त्याग के पूर्व की जीवनी है । इसका दूसरा भाग असिधारा पथ का यात्री तो योगी व्यक्ति को ही समझ में आता है जो साधना काल से सम्बन्धित है । तीसरा भाग केवल ज्ञान के बाद का है । इसको पढ़ते पढ़ते ध्यान लग जाता है । यह हमारी जडता, तेरा मेरा पन, साम्प्रदायिकता व कर्मकाण्ड को तोडता है । चैथा भाग महावीर से प्रेरित रूपान्तरण की गाथाओं से भरा है ।Anuttar Yogi
यह एक कट्टर जैन से उपर उठ कर लिखा गया उपन्यास है । इसमे दिगम्बर व श्वेताम्बर परम्पराओं की प्रचलित कथाओं को शामिल किया गया है । लेखक इसको खुल कर लिखता है । प्रकृति वर्णन बहुत है । लेखक इसमे व्यक्ति महावीर को तीर्थंकर महावीर बनने की जीवन यात्रा का वर्णन करता है। पढ़ते वक्त लगता है कि महावीर आस-पास ही कहीं है । पाठक उस काल में पहंच जाता है ।
महावीर को ऐतिहासिकता प्रदान करनें वाला यह उपन्यास उनकी पराऐतिहासिकता को भी इसमें शामिल कर देता है। यह ऐतिहासिक ही नहीं, पोराणिक जीवनी है, जिसके पात्र आज भी प्रासंगिक है। इसमें यथार्थ व कल्पना का ऐसा मिश्रण है जो सीधा पाठक को पचता जाता है। कहीं कोई शंका नहीं होती, पढते पढते पाठक अपनें को भी तोलनें लगता है। महावीर उसको अपनें लगनें लगतें है। इसमें हर तरह का सामजंस्य है। विरोध व वितण्डावाद कहीं नहीं है।
जीवनी, तर्क, मुल्य व घटनाऐ सब सच लगतें है व मन को छूते है। आत्मज्ञान में रूची हो तो यह पथ के कांटे हटाती है, मन में उजास भरती है, अपनी खोज में मदद करती है। अर्थात मन का अन्धेरा मिटानें में सहायक है । जैन दर्शन का पक्ष रखती है लेकिन सम्प्रदाय के बाडे से मुक्त करती है। वर्णन इस तरह है कि महावीर आज एवं अभी के लगतें है। उपयोगिता सर्वकालिक है । व्यक्ति से भगवान बनने की सिढी एवं आईना दोनों इसमें है। हमारें लिये आज सार्थक व उपयोगी है ।
इसको पढनें पर स्वयं का परीक्षण होता है। अपनी वृतियों, सोच व स्थिति को समझने में मदद मिलती है। अपनें मन के संकोच, दृष्टी व सीमाओं को देखनें का अवसर प्रदान करती है। इसको पढते पढते पाठक स्व को पानें लगता है। उसकी उलझनें सुलझनें लगती है। बहुत से प्रश्नों के उत्तर स्वतः मिलनें लगतें है ।
यह चित्रात्मक शैेली में लिखा गया है । भाषा उच्च श्रेणी की है । प्राकृतिक वर्णन सहज पठनीय है । पौराणिक प्रसंगों को आधुनिक संदर्भ में परोसा हुआ है । जैन पुराणो से भावान्तर कथाओं में मनोविज्ञानिक खोजे साकार हुई है। इसको पढ़ने से आध्यात्मिक यात्रा हो जाती है । अध्यात्म के गूढ़ रहस्य खुलते हैं । मुझे यह उपन्यास नहीं दर्शन का निचैड एवं हमारी संस्कृती का सार लगता है ।श्री जैन ने मन के पार के वर्णन बहुत अच्छी तरह किए हैं । चैथे आयाम की भाषा देना ध्यान के वश में है । रति, करूण व वैराग्य की गहराईयां बहुत साफ है । उनमे संवेदनाओं की सूक्ष्मता बहुत है । आन्तरिक प्यास व बाहरी दौड़ के संघर्ष का श्रेष्ठ चित्रण है ।

                                                                                                                                         ( To be continued…..)

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