क्या देवता होते है:समापन भाग

यह सत्य है कि महर्षि वेदव्यास एवं अन्य प्राचीन ऋषियों ने कोई भी तथ्य अकारण नहीं लिखा होगा। आचार्य उमास्वामी जिन्होंने जैन शास्त्रों में देवताओं का वर्णन किया है को पागल कुत्ते ने नहीं काटा था। जीवन में उन्होंने देवताओं का अनुभव किया होगा या फिर उनकी आवश्यकता समझकर उनकी रचना की होगी। अब खोज का विषय यह है कि देवताओं का उन्होंने अनुभव किया या उनकी रचना की।Does  angel exist?

लेकिन यह निर्विवाद प्रमाणित है कि देवताओं की उपयोगिता प्राचीन काल में निश्चित रही होगी। कर्मवाद को प्रमाणित करने प्राचीन रचनाकारों ने देवताओं का वर्णन किया है। हमारी संस्कृति के अलावा अन्य धार्मिक एवं सांस्कृतिक साहित्य में भी देवताओं का उल्लेख आता है। अर्थात अब हमें देवताओं की प्रासंगिकता की खोज करनी चाहिये।
तत्समय में देवताओं की प्रासंगिकता से वर्तमान में उनकी उपयोगिता प्रमाणित नहीं होती है। इसके उपरान्त भी उनकी आज भी धर्मभीरू लोगों के जीवन में उपयोगिता है।
लेकिन वर्तमान का शिक्षित युवक देवताओं से प्रेरणा की बजाय धर्म से घृणा करने लगा है। धर्म शास्त्रों पर से उसका विश्वास कम होता जा रहा है। अविश्वसनीय प्रतीत होती घटनाएं आज निरर्थक है। वर्तमान का धार्मिक साहित्य विज्ञान पर आधारित होना चाहिये।
आज आवश्यकता देवता तत्व और रूपी देवता (सशरीर) के बीच सामन्जस्य की है। प्रत्येक प्रसंग में अपेक्षानुसार देवताओं की उपयोगिता निर्धारित करे। फिर देवताओं के अभाव में भी प्रसंग के अर्थ को पकडे। अगर कोई अन्तर नहीं पडता है तो देवताओं को समझना सरल हो जाऐगा। देवतादि अतिविशिष्ट धारणाओें को समझे बिना हमारे प्राचीन साहित्य को नहीं समझा जा सकता है। प्राचीन शास्त्रों की कुन्जी हर कोई नहींे समझ सकता।
कथा साहित्य में देवताओं का अस्तित्व नही बल्कि इसमे कथा का प्रयोजन प्रमुख होता है। जैन दर्शन के दªव्यानुयोग में देवताओं का वर्णन कथा साहित्य को आधार देने के लिये है। चरणानुयोग में पंचम काल में देवता मृत्युलोक में नहीं आते कहकर समाधान किया है।
करणानुयोग में कर्म विज्ञान को समझाने देवताओं का सहारा लिया जाता है। इतिहासकार देवताओं के वर्णन को एक पौराणिक अवधारणा मानते है। समाज शास्त्री लोग देवताओं को एक विकसित आर्य जाति मानते हुए तथ्यों को समझते है। दार्शनिक लोग वस्तु में अन्र्तनिहित शक्ति को देवता तत्व मानते है। समस्त तरह से विचार करने पर यह निश्चित है कि देवता तथ्य नहीं बल्कि साधन है। वे जीवन को बेहतर जीवन बनाने के हेतू है।
दूसरे देवता ज्ञान चक्षु खोजने का एक माध्यम है। जब हम अपने प्रेरणा स्त्रोत का चित्र बनाकर उससे शक्ति प्राप्त करते है फिर स्वयं में स्थित किसी शक्ति विशेष को जागृत करने उस व्यक्ति को आकार देकर आत्म बल क्यों नही प्राप्त कर सकते है? चिन्तन, मनन के वास्ते कैसी शक्ति को कोई रूप देकर प्रेरणा लेने में आखिर बुराई क्या है? अगर हाॅं तो फिर देवताओं की धारणाओं में क्या बुराई है।
आज देवताओं के अस्तित्व पर निश्चित रूप से कुछ भी कहना कठिन है। क्योंकि इनका प्रमाण प्रस्तुत करना कठिन है। फिर भी इनको व्यक्ति नहीं, शक्ति या तत्व के रूप में मानना उचित है। आज भी उनकी उपयोगिता सिद्ध है। जैसे कि गणित में ग मानकर बहुत से प्रश्नों का हल किया जाता है। अतः देवताओं को स्वीकारने से हमारे कई प्रश्न सुलझ जाते है। अतः देवताओं को स्वीकारना सही दिशा में है। हाॅं उनका वर्णन, रूप, प्रकृति आदि पर मतभेद हो सकते है।

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