क्या देवता होते है?

आज का बुद्धिजीवी पौराणिक मान्यताओं को स्वीकारता नहीं है। देवताओं का प्रत्यक्ष प्रमाण अभी तक उपलब्ध नहीं है। इसलिये उनके अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह है। देवताओं का अस्तित्व आज संदेहों के घेरे में है। अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों एवं परामनोवैज्ञानिकों की खोजे पुराणों के तथ्यों के विपरीत है।
पुराणों में वर्णित देवताओं के स्वरूप, उनके प्रकार, उनके जीवन चरित्रों से आज का व्यक्ति प्रभावित नहीं होने वाला है। मात्र परम्पराबद्ध धार्मिक व्यक्ति ही उनका अध्ययन करता है। जिनकी भी संख्या समय के साथ घटती जा रही है। अतः देवताओं पर विचार करने में बुराई क्या है?यद्यपि उनके विवेचन में झझॅंटे बहुत है क्योंकि प्रत्येक ग्रन्थ में उनका वर्णन अलग-अलग है। फिर कई बार प्रयोजन भिन्न होने से एक ही ग्रन्थ में विरोधी बातें भी मिलती है। जब उनके वर्णन में एकरूपता नहीं है तो फिर उनकी व्याख्या में एकरूपता कैसे बैठाई जा सकती है।Angels
देवता का शाब्दिक अर्थ- देवत्व; श्रेष्ठता,एवं परिपूर्णता होता है। आचार्य श्री राम शर्मा ने तो देने वाले को देवता कहा है।देवता शब्द का अधिभौतिक अर्थ सशरीरी प्राणी होता है। भौतिकवाद में आकण्ठ सामान्य जन को पे्ररित करने लाभ-हानि का ध्यान रखना आवश्यक है। अतः उसे अनैतिक कार्य छुडा कर सन्मार्ग पर लाने एवं प्रभावित करने ऐसे कथन करना अनिवार्य मान कर हमारे महषिर्यो ने उनका वर्णन किया है।
देवता शब्द का अधिदैविक अर्थ थोडी विकसित मानसिकता वाले के लिये कभी सशरीरी प्राणी और कभी एक तत्व के रूप में होता है। चूंकि इस मानसिकता के लोग मध्यम श्रेणी के होते है।
देवता शब्द का आध्यात्मिक अर्थ एकदम देवता ही होता है। विकसित मानसिकता वाले ऐसे पुरूष चिन्तनशील होते है। वे समग्र दृष्टि युक्त होने से शब्द का प्रयोजन एवं प्रसंग अनुसार अर्थ ग्रहण करते है। आत्म तत्व के जिज्ञासु लोग आत्मा की शक्तियों से परिचित होने से पूर्व बात को ग्रहण करने योग्य होते है। वे देवता तक को प्रेरणा एवं अलंकार मानते है। सचमुच में आध्यात्मिक सन्दर्भों में देवताओं का अर्थ एक तत्व ही होेता है।
साहित्यिक दृष्टि से विचारने पर प्रकट होता है कि देवता एक अलंकार है। चूंकि सदैव कथा साहित्य में कथा का घटनाक्रम सत्य होना आवश्यक नहीं है, बल्कि कथा का प्रयोजन सही होना चाहिये। जन सामान्य की अद्भूत रस लोलुपता को ध्यान में रखकर पुराणकारों ने चमत्कारिक बातें लिखी है।

अतः ऐसे में तथ्यों की बजाय प्रयोजन परीक्षण की आवश्यकता है। धर्म गुरूओं एवं धर्म शास्त्रों का प्रयोजन व्यक्ति एवं समाज का कल्याण है। मानव अपनी कमजोरियों को पहचानकर उन पर विजय प्राप्त करे एवं स्वयं को सुखी बनाएं। पुराणों में अनेक तरह की कल्पनाएॅं मात्र अनुयायियों को धर्म मार्ग पर प्रेरित करने के लिये है।
आज जब युग बदल गया है। सामान्य जन का बौद्धिक स्तर पहले की अपेक्षा बढ गया है। हमारे बच्चों का आइक्यू हमसे अधिक है। ऐसे में हम पौराणिक मान्यताओं से प्रेरणा प्राप्त करने की बजाय उन्हें मिथ्या मानने लगे है। फलस्वरूप धर्म से हमारा विश्वास घटता जा रहा है। ऐसे में सामान्य जन को पुनः धर्म की ओर आकर्षित करने के लिये धर्मशास्त्रों में समयानुकूल संशोधन/परिवर्तन आवश्यक है। आज प्राचीन धर्मशास्त्रों के पोस्टमार्टम की बहुत आवश्यकता है। धर्म को विज्ञान के आलोक में ‘अप टू डेट’ बनाए बिना उसे जीवित रखना कठिन है। अतः देवताओं के अस्तित्व एवं स्वरूप की परीक्षा की आवश्यकता है। ज्ञान-विज्ञान के विकास की घडी को पीछे नहीं घूमाया जा सकता है। युग की मांग को अनदेखा करके धर्म को स्थापित नहीं किया जा सकता हैै।
अध्यात्म का विषय अदृष्ट है। अतः इसके निरूपण को यथायोग्य समझना कठिन है। अतः जैन दार्शनिकोें ने अनुयोग पद्धति, स्याद्वाद एवं अनेकंातवाद की एक कुन्जी बनाई है। जिसकी सहायता से गूढ से गूढ बात को समझा जा सकता है।
समस्त प्रकार के देवताओं के बारे में विचार करने से एक बात स्पष्ट होती है कि किसी भी वस्तु के सर्वश्रेष्ठ गुणों का निरूपण करने देवता की अवधारणा की गई है। धन में छिपी शक्ति को लक्ष्मी, बुद्धि की शक्ति को सरस्वती, निर्माणकारी शक्ति को ब्रह्या, धारण करने की शक्ति को विष्णु और संहारक शक्ति को शिव नाम दिया गया है।
सगुण उपासक इन शक्तियों का साकार रूप मानते है जबकि निर्गुण सम्प्रदाय इनको तत्व रूप में मानता है। वास्तव में यह सब उपासना का अलग-अलग ढंग होने से है। दोनों ही धारणाएं अपनी-अपनी जगह ठीक है। एक दूसरे के विरोधी होते हुए भी एक ही प्रयोजन के होने से सत्य है। अनुयायियों के अलग-अलग मानसिक स्तर होने से अलग-अलग तरह निरूपण किया गया है।

(To be continued…….)

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2 विचार “क्या देवता होते है?&rdquo पर;

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