साइक्लिक मेडिटेशन :शरीर को खींच कर छोड़े व तनाव कम करें

शरीर की मांसपेशियांे को खींचने-कड़क करने से शरीर में उद्दीपन बढ़ता है जो उसके शिथिल करने पर शान्त हो जाता है । इसी के द्वारा मन को उद्दीपन व शान्त किया जाता है ।C M
शरीर को उद्दीप्त करने वर रक्तदाब, हृदयगति, तन्त्रिकाओं में विद्युत्तिय व रसायनिक आवेग बढ़ते, नाडि़यों में प्रवाह की गति, त्वचा में कड़कपन, मांसपेशियों में खींचाव, श्वसन गति, संवेदनशीलता व मस्तिष्क की गति बढ़ती है इससेे व्यक्ति के परसेप्शन की गति, समझने की गहराई व विश्लेषण की गति बढ़ती है । इससे उसका होश बढ़ता है । अर्थात विचारों की गति बढ़ने से चिन्ता करने के लूप में तब वह उलझ जाता है । यह तनाव का बढ़ना है ।
संवेदनशीलता के चक्रव्यूह से बाहर आने शिथिल कर अपने होश को बढाते है । अपने को ढीला छोड़ दे । स्वयं को मुूक्त करें । शरीर को शिथिल करते ही रक्त दाब, हृदय की गति, श्वसन दर, विचारों की गति कम होती है । इससे बाहर जाने वाला ध्यान अन्दर एकाग्रता बढ़ाता है जिससे होश बढ़ता है व मन शान्त होता है । तन्त्रिकीय आवेगों को हृदय व मस्तिष्क के साथ समक्रमिक व समायोजित करना है । अर्थात मांसपेशियों व तन्त्रिकाओं को मालिश करना है ।
बिन्दु एकाग्रता को रेखिय होश में बदलते है । रेखिय होश पृष्ठ होश बनता है । फिर पृष्ठ होश को द्वि- विमिय होश में बढ़ाते हैं । वह फिर त्रिविमिय होश बन जाता है । बढ़ते हुए वह समुह व सर्वहोश बन जाता है । यह फैलाव मन को शान्त करता है । योग संवेदनशीलता को बढ़ाना है लेकिन उसक जाल मंे फंसना नहीं, चक्रव्यूह से बाहर निकलना है । बन्दर मन को एकाग्र कर शान्त कर होश में बदलना है ।अपने शरीर व मन के बिगड़े सम्बन्धों को पुनः संतुलित करना है । शिथिलता को ओर बढाना व गहरा करना है । मन में व्याप्त विश्रान्ति को मुक्त करना है ताकि वह अपनी सहज अवस्था मंे आ सके । प्रयत्न व शिथिलता में मधुरता स्थापित करना है । दबाव मुक्त होने से शरीर अपनी सामान्य अवस्था मंे पुनः आ सके ।
होश बढ़ाने के लिए ध्वनि का उपयोग करते है । ऊंॅ-कार की ध्वनि शरीर में होश को बढ़ाती है । ओम का उच्चारण एवं उससे उत्पन्न कम्पन्न अर्थात अनुनाद शरीर को शिथिल करता है ।

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