यहां मेरा कुछ नहीं है, सब पर के सहयोग से है

मैं जीवन रूपी समुद्र की लहर का एक अंश हूं ।यह जीवन मेरा अकेले का नहीं है । यह मेरे माता-पिता व प्रकृति के योग से निर्मित है। यह अणु-परमाणुओं का फैलाव व जौड़ अस्तित्व के नियमानुसार है । आकाश से यह फैला है, पृथ्वी से जुड़ा है, जल के कारण तरल है, अग्नि से संचलित है एवं हवा से जीवन्त है ।
वास्तव में यहां मेरा अपना कहने लायक कुछ नहीं है । यह विचार कई शक्तियों व प्रेरणाओं से उभरे हैं । अनेक क्रियाओं प्रतिक्रियाओं के फलस्वरूप है । अनेक लेखों, पुस्तको व संदेशों से उपजे हैं । आलोडन व विलोपन का फल है । मन के जालों को बनने बिगड़ने से बने है । न मन मेरा है न तन मेरा है । न विचार मेरे हैं न उद्गार मेरे है । कई संयोगो-वियोगों के परिणाम से है ।
जैसे कि नौकरी कई साथियों के सहयोग से मिली है । यह मेरे अकेले प्रयत्नों का परिणाम नही है । अनेक साथियों व सत्ताओं के भरोसे चल रही है । पढ़ाई से जो ज्ञान-अनुभव हुए उन सबमे स्कूल, शिक्षकांे, पुस्तकों व मित्रों का सहयोग है । सब तरफ से आर्शिवाद मिल रहे हैं तभी तो यह जीवन संभव है ।
मेरे होने से मेरा योगदान यहां पर शून्य है । अनेक साथियों की सहायता, सŸााओ, कर्मों व भावनाओं का यह जोड़ है । यह अपने आप ऐसा नहीं हो सकता था । यह सबके सहयोग का परिणाम है । मेरे पर सबका प्रभाव है । यह अकेला कुछ नहीं है, न यह अकेला कुछ कर सकता है । यह सबका जोड़, जुगाड़ है, फल है ।
इसलिए किसी को यहां पर इतराने की जरूरत नहीं है । यह जीवन अस्तित्व का वरदान है। इसका उपयोग नेक कर्मों को करने हेतु प्रकृति ने रचा है । अतः इसमे अहं कर अपनी चलाने की जरूरत नहीं है । ईश्वरीय सŸाा आपको जैसे रखे, वैसे प्रसन्न रहो । इसमे अपनी इच्छाओं को डालने की जरूरत नहीं है । यह ज्योति उसको जलाने से है । उसने अभी तक न बुझाई है तो यह उसका अहसान है । इसमे तुम्हारा क्या योगदान है जो इतराते हो । बस, उसी का गुणानुवाद करो । उसी का प्रताप मानो । उसी के वरदान को भोग रहे हो तो उसी में मस्त रहो । इसमे चाह की टांग न लड़ाएं। जा विध राखे राम ता विध रहिए राम ।
हम सब बहुत सी शक्तियों, भावों व कर्मों की मिक्सी में पीस कर अवतरित हुए है । प्रतिक्षण सृजन उसका चल रहा है । उसके अंश हो, उसी की लीला के परिणाम हो । यह जीवन तुम्हारा नहीं है। उसका संचालन वही नियन्ता करता है । तुम उसकी कठपूतली हो। फिर बनने, पाने का अहंकार क्यों पाले हुए हो ।
यह जीवन उस लीलाधर का है । यह उसी की लीला है । यहां सफलता पाना तुम्हारे वश का नहीं है । यह सब परम सŸाा का खेल है । तुम यहां हो ही नहीं, जैसे कि बूंद स्वयं को सागर समझे या उड़ता पत्थर कहे कि मैं चल रहा हूं । मैं उड़ता हूं । महल में आया पत्थर समझे कि मैं यहां आया हूं । विजेता हूं । शुक्रिया
मैं जीवन रूपी समुद्र की लहर का एक अंश हूं । व्यक्ति विशेष का यहां कोई वजूद नहीं है। हम समग्र के अंश है । हमारा निज यहां कुछ नहीं है । मुझ पर सबका ऋण है । मै ऋणी हूं । मेरी कोई जीत नहीं है । मेरी कोई हार नहीं है। मैं कुछ जीता नहीं हूं । सब उसके ऐहसानों का योग है । उसी को अपना ’’मैं’’ कहना मेरी भूल है । यह मेरा अज्ञान है ।
हम एक प्रक्रिया है या उसके अंश है । इस प्रक्रिया को अपना बताना नादानी है । इस प्रक्रिया पर हमारा कोई वश नहीं है ।

यहां मेरा कुछ नहीं है, सब पर के सहयोग से है&rdquo पर एक विचार;

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