सुख का अर्थशास्त्र – हेलेना नोरबर्ग होज की नजर में स्थानीयकरण

वैश्वीकरण व उदारीकरण ने हमारी संस्कृति पर हमला किया है । जीवन में लाभ ही प्रमुख हो गया है । हम सबको धन के पिछे लगा दिया है । धन ही एक मात्र खुशी का स्त्रोत नहीं है ।economics of happiness इससे हमारी खुशी कम हुई है । उदारीकरण का अर्थ बाजारीकरण हो गया है । सिर्फ आर्थिक लाभ ही प्रमुख हो गया है । बड़ी कम्पनियां लाभ कमाने हेतु सरकारों को खरीद रही है । इससे सारी दुनिया में बेरोजगारी बढ़ी है, प्रसन्नता घटी है, प्रतियोगिता बढ़ी है, आत्मविश्वास कम हुआ है । अपराध बढ़े हैं, शान्ति घटी है । कुछ लोग अमीर तो अधिकांश गरीब हुए हैं । प्रसन्नता को प्राप्त करने की कला मात्र अर्थशास्त्र मंे नहीं है ।
हेलेना इसका उदाहरण लद्दाख से देती है । वह बताती है कि 1975 में पहली बार जब वहां गई थी, तब वहां पर कोई बहुत गरीब नहीं था, अपराध नहीं थे, आपसी सद्भाव एवं भाईचारा था । अब जब 1990 के बाद वहां बाहर के लोग पंहुचे है, कोकाकोला आदि पंहुचे है, अपराध बढ़े हैं । भाईचारा खत्म हो गया व उनमे हीन भावना बढ़ी है। प्र्रश्न यही है कि क्या हमने उन्नति की है ?

इसका समाधान स्थानीकरण में है ।

                                                                                                                                         (To be continued……)

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2 विचार “सुख का अर्थशास्त्र – हेलेना नोरबर्ग होज की नजर में स्थानीयकरण&rdquo पर;

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