योग के अनुसार हमारा निर्माता कौन / जीवन का सत्य क्या है : अंतिम भाग

ऋषि फिर भी संतुष्ट न हुए व और गहरा उतरने को कहा । महर्षि वरूण ने अपने पुत्र व शिष्य को पुनः तप करने को कहा । वह इस बार वह लौट कर नहीं आया ही नहीं । वरूण ने जाकर देखा कि वह आनन्द में मग्न है । उसने सब कुछ पा लिया है । वह स्व मिटने से नहीं आया । उसने जानने योग्य सब कुछ जान लिया था । वह ज्ञाता दृष्टा होने से सर्व हो गया था । आनन्दमय कोश को प्राप्त कर चुका है । जो अन्य शरीरों का आधार है । यह पांचवा शरीर है ।aum
प्रत्येक कोश स्वतन्त्र भी है एवं एक दूसरे से जुड़ा हुआ भी है । इनमे एक भीतरी लय है । जब भी एक कोश में उपद्रव होते है तो दूसरा उससे प्रभावित होता है ।
अन्नमय कोश को छोड़कर शेष चार कोश अदृश्य व सूक्ष्म है । अतः उन पर सीधे कार्य नहीं किया जा सकता है । अतः भौतिक शरीर के द्वारा ही क्रिया कर इनसे शरीरों में आए विकार दूर किए जा सकते हैं ।
भारतीय दर्शन हमारे पांच शरीर मानता है । पश्चिम का दर्शन सिर्फ भौतिक शरीर मानता है । इस आधार पर वह तनाव जनित रोगों का समाधान नहीं खोज पाया । लेकिन योग हमारे भौतिक शरीर का कारण सुक्ष्म शरीरों का मानता है, जिनमे चिकित्सा कर स्थूल शरीर को ठीक किया जाने लगा ।
आसन, क्रिया, सूक्ष्म व्यायाम, भौतिक आहार से स्थूल शरीर संतुलित किया जाता है । प्राणायाम व श्वसन क्रियाओं द्वारा प्राण शरीर को मुक्त किया जाता है । हमारी चाहतें व ईष्र्या मनोमय शरीर में होती है । हमारी भावनाओं को ऊंचाकर, भक्ति व समर्पण द्वारा इसे संतुलित किया जाता है । प्रार्थना, मन्त्रोचारण, जप द्वारा भावनाओं को परिष्कृत किया जा सकता है । विवेक को उत्पन्न कर विज्ञानमय शरीर को जीता जा सकता है । दृष्टा होकर पांचवे कोश में जीआ जाता है ।

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