आरोग्यधाम, एसव्यासा, बैंगलोर से 7 अनुकरणीय बातेंजो मैंने सीखी

  • प्रत्येक योगासन व प्राणायाम करने के बाद अपने भीतर होने वाली प्रत्येक परिवर्तन अर्थात् हलचल, संवेदना, दर्द, कड़कपन आदि को देखना है । प्रत्येक घटना, वचन, कर्म का मन पर प्रभाव पड़ता है । इससे अन्र्तदर्शन बढ़ता है । स्वयं का ज्ञान होता है । उस प्रतिक्रिया को शान्त होकर देखना है । इससे हमारी अन्तर्यात्रा प्रारम्भ होगी । स्व को जानने व जीतने हेतु यह जरूरी है । भारतीय दर्शन का प्रमुख लक्ष्य भी यही है । s- VYASA
  •  प्रतिमिनट 15 श्वांस लेना आदर्श है । मैं प्रतिमिनट 20 श्वांस लेता हूं जो ठीक नहीं है । इसलिए अपनी श्वांस की गति धीमी व गहरी करनी है । यह जल्दबाजी एवं उच्च रक्तचाप का कारण है । मै तुरन्त प्रतिक्रिया भी इसी कारण करता हुं । तीव्र गति से श्वास लेने से पंचकोषों के बीच लय टूटता है । जिससे विभिन्न रोग पैदा होते हैं । मन को शान्त करने में यह सहायक है । अपनी श्वास की गति मंद होने से शरीर एवं मन के बीच मधुरता पैदा होती है । मन स्वतः शान्त होता है। श्वसन की गति घटाकर होश में आराम किया जा सकता है ।
  • भ्रामरी करने का समय बढ़ाना है । यह 20 से 40 सैकण्ड तक का होना चाहिए । इससे फैफड़े की मजबूती प्रकट होती है। भ्रामरी प्राणायाम करने से मन शान्त होता है । मन में उठने वाले विचारों की संख्या घटती है । भ्रामरी करने से मस्तिक की मालिश हो जाती है। चिन्ताओं व निराशा से कम होती है ।
  • राजयोग के अनुसार पतंजली का अष्टांगीक मार्ग उपयोगी है। मात्र आसन ध्यान से आन्तरिक विकास नहीं होगा। भक्तियोग, कर्मयोग एवं ज्ञानयोग भी इसमें सहकारी है। 
  • गुलाब जामुन को 5 मिनट तक जिव्हा पर रख कर आनन्द लो फिर उसे थूक दो ताकि नुक्सान कम से कम हो । मधुमेह का रोगी भी इस तरह गुलाब जामुन सेवन कर सकता है ।
  •  भोजन मे प्रतिदिन एक सब्जी उबली हुई व छाछ जरूर हो। रागी नामक स्थानीय अन्न (मोटा अनाज) का सेवन करें। 
  • प्रतिदिन सोने से पूर्व एवं जागते ही नौ बार नाडी शुद्वि व पांच चक्र भ्रामरी प्राणायाम के करनें है । इससे शरीर में शिथिलता बढ़ती है । शरीर स्वस्थ होता है । उतावल पर लगाम लगती है। प्रतिक्रिया करने की गति घटती है। सकारात्मकता बढ़ती है। दिन भर प्रसन्न्ता रहती है ।

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