कला साहित्य को मनोरंजन बना रहा है बाजार

हमारे जीवन में आंख खोलने वाले, स्वयं को राह दिखाने वाले, मूल्य सीखाने वाले कला-साहित्य आज स्वयं बाजार के शिकार है । जो दीपक है उसे ही बाजार अपने अनुसार करने हेतू प्रयत्नरत है । प्रेमचन्द की बजाय शिवखेड़ा पढ़ा जाता है । विशुद्ध साहित्य नही बल्कि प्रेरक साहित्य बिकता है ।art bazar
सिस्टम मनुष्य पर भारी पड़ रहा है । उजाले पर ही पहरे बैठे हैं । आज सब ताकत बाजार के हाथ है । बाजार की शक्ति निर्धारक होती जा रही है । इससे बचना कठिन है । बाजार हर चीज को कीमत में आंकता है । मुनाफा जीवन का मन्त्र हो गया है । हर चीज रूपयों से तोली जाने लगी है ।
मीडिया पूंजीपतियों के चुंगल में है । विज्ञापन दाता क्या छपेगा या दिखेगा हम करते है । मीडिया मालिकों को मूल्यों से सरोकार नहीं है । वे टी.आर.पी. से चलते हैं । सही बात मौलिक दृष्टि गोल है । मांग के अनुरूप परोसा जाने लगा है ।

कला साहित्य को मनोरंजन बना रहा है बाजार&rdquo पर एक विचार;

  1. बाज़ार में लगातार गिरावट ही आ रही है मालूम नहीं आजकल टीवी में भी ऐसे सीरियल आ रहे हैं जिनमे 1000 कड़ियाँ बनाने की होड़ लगी है। कहानी(?) कोई नहीं, बस तमाम नकारात्मक विचार, एक दुसरे के लिए दुर्भाव, सन्देश कोई नहीं और कभी न ख़त्म होने का सिलसिला।

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