विचारों का प्रभाव: राजा किसी सेठ को फांसी पर क्यों चढा़ना चाहता है ?

हमारा मन विचारों से ही बनता है। हम मन के अनुसार अर्थात विचारों के अनुसार चलते है। अतः विचारों को बदलना स्वयं को बदलने हेतु जरूरी है।
एक राजा ने अपने जन्म दिन पर नगर के प्रमुख साहुकारों को भोज दिया। भोज के दौरान प्रत्येक सेठ से राजा स्वंय मिला। राजा सभी सेठों से मिलकर प्रसन्न हुआ। लेकिन एक सेठ से मिलने पर राजा के मन में भाव आया कि इस सेठ को फांसी दे दी जानी चाहिए। राजा ने तब तो कुछ नहीं कहा लेकिन इस तरह का विचार मन में उठने का कारण खोजने लगा।
दूसरे दिन राजा ने अपने मन्त्रियों से उसके मन में उक्त विचार आने का कारण पूछा। एक बुद्धिमान मन्त्री ने कहा कि इसका पता लगाने का वक्त दिया जाय। मन्त्री ने अपने गुप्तचरों से उस सेठ के बारे में जानकारी इकट्ठी करवाई।
कुछ दिनों बाद गुप्तचरों ने बताया कि वह सेठ चन्दन लकड़ी का व्यापारी है। लेकिन विगत तीन-चार माह से उसका व्यवसाय ठीक नहीं चल रहा था। अतः वह सोचता है कि राजा की मृत्यु हो जाय तो उसकी ढेर सारी चन्दन की लकड़ी बिक जाय। अतः वह राजा की मौत की कामना करने लगा। सम्राट के सेठ से मिलने पर सम्राट के अचेतन मन ने सेठ के मन के भावों को पढ़ कर प्रतिक्रिया कि सेठ को फांसी पर चढ़ाना चाहिए।

मन्त्री बड़ा चतुर था। उसने सोचा सम्राट को यह बता दे तो सेठ अनावश्यक खतरे में पड़ जाएगा। इसलिए उसने एक तरकीब सोची। सेठ से प्रतिदिन दो किलो चन्दन की लकड़ी महलों में उपयोग हेतु खरीदनी शुरू की। अब प्रतिदिन दो किलो चन्दन की लकड़ी बिकने लगी। सेठ सोचने लगा कि राजा चिरायु हो। उनसे उसका व्यवसाय हो रहा है। राजा के बदलने पर नया राजा रोज लकड़ी खरीदे या नहीं इसलिए वह राजा की लम्बी उम्र की कामना करने लगा।
राजा ने अगले वर्ष फिर अपने जन्म दिन पर बड़े सेठों को भोजन पर बुलाया। इस बार राजा उस सेठ से व्यक्तिगत रूप से मिले तो उसे लगा सेठ बहुत अच्छा है। इसकी आयु लम्बी होनी चाहिए। अब इस तरह के विचार आने का कारण राजा ने फिर मन्त्री से पूछा। मन्त्री ने बताया कि राजा हम सब का मन बहुत सूक्ष्म है, हमारा अचेतन मन सामने वाले के मन में गुप्त चलते विचारों का चुपचाप पकड़ लेता है। उस पर स्वतः प्रतिक्रिया करता है। इस बार सेठ आप की आयु बढ़ाने की प्रार्थना मन ही मन करता था। चूंकि इससे उसका व्यवसाय चल निकला था। प्रतिदिन दो किलो चन्दन की लकड़ी बिक रहीं थी। अतः उसके मन में चलते गुप्त विचारों को आपके मन को पकड़ लेता है।
हम विश्वास कर विश्वास पाते हंै। अविश्वास कर दूसरे को अविश्वास करने का अवसर देते है। हम यदि जीवन में सुख चाहते हैं तो हमें दूसरों पर बिना कारण अविश्वास नहीं करना चाहिए। हमारे यहाँ अभी चारों तरफ अविश्वास हैं। अविश्वास संदेह को बढ़ाता है।
हमें सकारात्मक होने के लिए बिना कारण किसी पर भी अविश्वास नहीं करना चाहिए। जीवन में सफल होने के लिये दूसरों पर भरोसा कराना चाहिए। यथापि इसमें कभी कभी अस्सी बीस का सिद्धान्त लागू करें। भरोसा करेगें तो आप के काम बनेंगे। कभी ठोकर लगे तो इसे अपवाद मान ले। बिना परीक्षण किए सब को गलत या चोर मानना गलत है।

जब हम किसी से घृणा करते हंै तो हम अनजाने ही उस व्यक्ति को घृणा करने के लिए प्रेरित करते है। हम सब के व्यक्तित्व में कुछ गुण जन्मजात होते है। उनको तो बदलना थोड़ा कठिन है। लेकिन कुछ गुण हम यहीं पर सीखते है, उन्हें बदलना आसान होता है। यदि कोई पूरी तरह जन्मजात नकारात्मक है तो उसे हम इस तरह सकारात्मक विचार कर नहीं बदल सकते हैं। लेकिन जिसने वातावरण से नकारात्मकता सीखी है उसे हम अच्छे विचार कर बदल सकते है।

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