दिवाली आदि त्यौहार अवचेतन की धुलाई में सहायक

अवचेतन की धुलाई जीवन में मनोरंजन  में सहायक है।

मन को स्वस्थ करने हेतु मन का रंजन करना अत्यावश्यक है। खुशी का सृजन मन में ही होता है। अतः खुश रहने में मनोरजंन सहायक है। हम स्वयं जिस तरह का जीवन जी रहे हैं अब उसमें सुगन्ध, मिठास एंव मस्ती नहीं है, त्वरा नहीं है, उत्साह नहीं है, जीने की ललक नहीं है। ऐसे मेें हम जिस तरह से जी रहे हैं, उस पर विचारने की जरूरत है। उसे बदलने की दरकार है। इसे बदले बिना जीवन में रस, ऊर्जा, रगं नहीं आ सकते है।
अच्छे मनोरजनं का उद्देश्य हमारी विचार शक्ति को धार देना तथा भावनाओं को विकसित करना है। भावनाओं का विरेचन भी इससे होता है। हम जब देवदास की त्रासदी पर रोते हैं तो हमारा दुःख भी बहता है। भावनाओं का उदात्तीकरण देख कर भी उच्च भावनाएँ मजबूत होती है। बुरी भावनाओं का बुरा परिणाम देख कर हमारी बुरी भावनाएं कमजोर होती है। हमारी भावनाओं का रेचन हो जाता है। हमारा अवचेतन का बोझ हल्का हो जाता है।
मनोरजनं समय काटने का उपक्रम नहीं है। यह हमें अपने से परिचय कराता है। हमारी सोच को स्पष्ट करता है व नये उदाहरण से हमारी धारणाओं को पुष्ट करता है। यह हमारे भावजगत को फैलाता है। हमारे भीतर सच्चाई को सहलाता है। तभी तो इसे मन बहलाने का साधन भी कहते हैं। यह मन को नहीं हमारे दुखों को भी धोता है। व हमारे मुल्यों को मजबूत करता है। तभी तो कहते है कि मनोरंजन के वो साधन अच्छे हैं जो उच्च मूल्यों को बढ़ावा देतें हैं।
मनोरंजन के साधनों से मनुष्य के मन का बोझ हल्का होता है तथा मस्तिष्क और नसों का तनाव दूर होता है।इससे नव जीवन का संचार होता है। पाचन क्रिया भी ठीक होती है। देह को रक्त संचार में सहायता मिलती है।विज्ञान ने हमारी मनोवृत्ति को बहुत बदल दिया है। बहुत सारे साधनों से मनोरंजन के साथ- साथ पर्याप्त व्यायाम भी होता है। परन्तु यह स्मरण रखना चाहिये कि अति सर्वत्र बुरी है। इसलिये समयानुसार ही मनोरंजन के साधनों का लाभ उठाना चाहिये। मनोरंजन के साथ-साथ ज्ञानार्जन भी होना चाहिये। सस्ता मनोरंजन बहुमूल्य समय को नष्ट करता है। मनोरंजन के साधन से हमारी रुचि, दृष्टिकोण एवं स्तर का पता चलता है। विनाश और पतन की ओर ले जाने वाले मनोरंजन से अवश्य बचना चाहिये। मनोरंजन वही बढि़या है जो हमारे ज्ञान एवं चरित्र-बल को विकसित करे। स्वस्थ और सोद्देश्य मनोरंजन किसी भी स्वस्थ व समृद्ध समाज की मूलभूत आवश्यकता भी होता है और पहचान भी।

मनोरजंन का प्रबन्धन स्वंय को राजी रखने हेतु बहुत जरूरी है। किसी भी तरह से स्वंय को खुश रखंे। मनोंरजन उद्योग निरन्तर फैलता जा रहा है। इसकी दिशा व दशा किसी से छिपी नहीं है। कम से कम उसे आज स्वस्थ तो नहीं कहा जा सकता है। बाजारवाद व विज्ञापन इसे तय करते हैं। हम नहीं जानते कि मनोंरजन का स्वरूप कैसा होना चाहिए ? हमें कैसा मनोंरजन चाहिए ? हमें क्या अच्छा लगता है,व क्या हमें तरोताजा करता है? कहां हमें आनन्द आता है?
आज मनोंरजन के साधन बाजारवाद के शिकार हो गये है। उनमें तरह-तरह की विकृतियां आ गई है। तभी तो जीवन से स्वस्थ मनोंरजन गायब होता जा रहा है। फूहड़ता, हास्य, व्यंग्य, टांग खिंचाई ही रह गये है। सांस्कृतिक शून्यता के माहौल में नग्नता,अश्लीलता फूहड़ता ही राहत देते हंै। हमारे यहां सांस्कृतिक-शून्य कुछ ऐसा है कि ऊब के मारे लोग वक्त काटने के लिए मनोरजंन के नाम पर कुछ भी बरदाश्त कर लेते हैं।
ऊब का अर्थ है-अनचाहे काम में डूबे रहना। थकें मादें दर्शक ऊब के शिकार है।आज-कल सीरियल ऊब से ऊब को मारने के प्रयास हैं। यह वैसा ही है जैसा कि निराशा दूर करने के लिए शराब पीना। जबकि मेडिकल साईन्स शराब को निराशा बढ़ाने वाला पेय मानती है।

जैसे कि मैं आधी सदी पार करके भी नहीं जानता कि मुझे क्या अच्छा लगता है। मुझे कहां से ताजगी मिल सकती है ? फिल्म का स्वाद लेना मुझे नहीं आता है। निर्मल आनन्द से मेरा वास्ता कम ही पड़ता है। फिल्म का मजा कैसे लेना ?
मसाला फिल्में सार्थक फिल्म से कैसे भिन्न है। कला फिल्मों में क्या होता है ?

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4 विचार “दिवाली आदि त्यौहार अवचेतन की धुलाई में सहायक&rdquo पर;

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