सुखी होने अन्तर्यात्रा करें व अन्तर्मन की सुने

ज्यादातर लोग कभी अपनी अन्तरात्मा की आवाज नहीं सुनते है।
                                                                                                                    – स्टीफन आर. कवि

हम अपने सूक्ष्म शरीर एवं भाव जगत् को व्यवस्थित करने के लिए आन्तरिक अवलोकन करते हंै।
शरीर एवं उपनिषद् सिखाते हैं,-‘यत् पिण्डे,तत् ब्रह्मांडे’। दीपक चोपड़ा ने लिखा है-मानव देह ब्र्रह्मांड की अभिव्यक्ति है। जिन तत्त्वों और शक्तियों से ब्र्रह्मांड बना है, उन्हीं से हमारा शरीर,मस्तिष्क एवं आत्मा भी बने हैं। सूक्ष्म और विराट दोनों एक ही है। मानव-देह और ब्रह्मांडीय-देह एक ही है। मानवीय-मस्तिष्क और ब्रह्मांडीय-मस्तिष्क एक ही हैं। यही वेदों का मूलभूत संदेश और सिद्धांत है।हम किस प्रकार सोचते हैं, महसूस करते है, स्मरण करते हैं, और कल्पना करते हैं, ये सारी बातें हमारी देह को प्रभावित करती है। लेकिन स्व-संवाद की कमी के कारण हम अपने से दूर चले गये है। स्व संवाद का अर्थ है-आपके मन में चलने वाला वार्तालाप। लोग बाहर से तो अपने आपको बदल लेते हैं परंतु अंदर से वैसे ही रहते हैं। जब तक आप अपने बारे में जो खयालात रखते हैं, उन्हें नहीें बदलते, तब तक आप अंदर से स्वयं को नहीं बदल सकते। आपके विचार आपको जो खबर देते हैं, आप अपने आपको वही मान लेते हैं। इसलिये पहले आपको अपने अंदर चलने वाले विचारों को बदलना हेगा। स्व संवाद बदलने से आप अंदर से बदल जाते हैं, यही स्व संवाद का जादू है।

अपने शरीर के संकेतों को सुनें। हमारा शरीर अपने ऊपर होने वाली ज्यादतियों का विरोध प्रकट करता है। शरीर की थकान,सोने की इच्छा,काम न करने का मन, सरदर्द आदि ऐसे संकेत हैं। जब कभी पानी पीने का भाव जगे, शौच एवं पेशाब करने की इच्छा हो तो उसे तत्काल पूरा करें, संकोच की जरूरत नहीं है।
अन्र्तप्रेरणा सुनंे और जीना सीखें। हम अपनी व्यस्तता के कारण अपने से ही बहुत दूर चले गयें हैं । इस संसार में हमारा दूसरों से बहुत कम संवाद हैं एवं स्वयं से भी संवाद नहीं के बराबर हैं । हम अपने अन्र्तमन के संकेतों व संदेशों को ग्रहण नहीं करते है। जब आप अपनी बात नहीं सुनते है तो दुनिया में किसी ओर की बात कैसे सुन सकते हैं । हम अपनी सबसे ज्यादा अनदेखी करते हैं। कई बार मनुष्य का अचेतन घटनाओं का विश्लेषण कर कुछ सूचनाएं व संकेत देता है लेकिन तब हम उस पर ध्यान नहीं देते हैं । आपका शरीर, मस्तिष्क, मन और आत्मा निरन्तर कुछ न कुछ किसी न किसी रूप में आपसे कहते रहते हैं। अपनी अन्र्तप्रेरणा ही आपकी सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शक है । इस स्त्रोत का लाभ उठाकर व्यक्ति चाहै हेे जितनी उन्नति कर सकता हैं । पाओलो कोएलो ने एल्केमिस्ट को साफ तौर पर ऐसे संकेत ग्रहण करते हुए दिखाया है । वह प्रकृति द्वारा दिए जाने वाले संकेतों एवं लक्षणों को महत्व देने के कारण ही सफल होता हैं।

शरीर की भाषा समझें। जब हल्का सर दर्द हो तो उसे दो रुपये की गोली या पेनकिलर लेकर दबाने की कोशिश न करें। अच्छा हो कि विश्राम करें। कैसी विड़म्बना है कि आप अपने शरीर को रोगी बनाएँ व डाक्टर उसे ठीक करे। दवाइयाँ आपात काल के लिए है। सामान्य परिस्थिति में उनका सेवन ठीक नहीं है। डाॅक्टर व दवाइयाँ आपके लिए ही नहीं है; उनमें डाक्टर व दवा बाजार की ताकतेें शामिल हंै जो आपके पक्ष में नहीं है।
मानव-देह जीवित मन्दिर है। इसके होने से आप हैं। अस्तित्व इसके द्वारा आप को अभिव्यक्त करता है। अतः इसका ध्यान रखंे। शरीर के सकेतों को अनसुना न करें। यह गूंगा जरूर है, लेकिन प्राणवान है। अतः इसे मित्र बनाएँ।
अपने शरीर से संवाद नहीं होने से हमारा उस पर नियन्त्रण नहीं रहताहै। ऐसे में शरीर स्वंय मालिक हो जाता है। वह एक सीमा के बाद अपनी रिपेयरिंग नहीं कर सकता है। ऐसे में हमारी उम्र घटती है।इससे बुढ़ापा शीघ्र आ जाता है।
प्रतिदिन हम भोजन करते हैं। लेकिन क्या खाना चाहिए एंव कितना खाना चाहिए यह बहुत कम लोग जानते हैं। स्वाद के कारण हम इस शरीर पर कई बार अनावश्यक बोझ डाल देते हंैै। फिर कहते हंै कि मुझे अपच है, गैस रहती है। नोबेल पुरस्कार विजेता डा.लिनस पोलिंग ने कहा था कि आप लोग जो भोजन करते हैं वह पच्चीस प्रतिशत आप के लिए है, शेष पिचहतर प्रतिशत भोजन आप डाक्टरों के पेट के लिए करते हैं।
जब कभी हम नकारात्मक होते हैं तो तत्क्षण शरीर में अनेक तरह के हानिप्रद रसायन बनने लगते हैं। हमारा शरीर दुनिया की सबसे बड़ी फार्मास्युटिकल फैक्ट्री है। यह अपने मस्तिष्क के कमाण्ड पर अनेक तरह के रसायन बनाता है।
ईश्वर की सबसे बड़ी कृति इंसान है। हमारे पास सर्वश्रेष्ठ साधन है। प्रकृति की सारी व्यवस्था है। इसके उपरान्त भी हम अपने अहं व लोभवृत्ति के वश में होकर इस शरीर पर अनेक तरह के अनावश्यक बोझ  लादे हुए हैं।

( मेरी पुस्तक जियो तो ऐसे  जियो से)

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