मरने के लिए नहीं, जीने के लिए( तनाव मुक्त होने ) जहर पीओं

कायर आत्महत्या करने हेतु जहर एक बार पीते है लेकिन शुरवीर हम है जो जीने के लिए कई बार जहर पीते है। भगवान शिव ने भी तो जहर पीआ था, हमें भी पीना पड़ता है। जैसा शीव ने जहर को गले के नीचे नहीं जाने दिया, वैसे ही हमें भी इस जहर को गले के नीचे नहीं जाने देना है। अर्थात् इस जहर से अपने पूरे शरीर को हानि नहीं पहुँचानी है। जीवन जीने की कला द्वारा उक्त जहर को निष्प्रभावी बनाना है।
जहर अनेक तरह के अपने परिजन ज्यादा पीलाते है। रस्मों, जातिवाद, तेरा-मेरा के जहर होते है। यहाँ हमारी इच्छाओं का सम्मान कोई नहीं करता है। हम कभी भी कहीं समाज में स्वतन्त्र नहीं है। सर्वत्र परम्पराएँ जहर पीलाती रहती है। न चाहते हुए भी हमें उसी अनुसार करना पड़ता है।
हम पर इतने दबाव होते है कि हम अपनी ईच्छा से कपड़े तक नहीं पहन सकते है। बात भी वही करनी पड़ती है जो दूसरों को सुहाती है। जो लोग हमें तरह-तरह से डूबाते है उनका सम्मान कराना पड़ता है। जिन लोगों की हम शक्ल नहीं देखना चाहते है उनकी मेजबानी करनी पड़ती है।
सामाजिक व जातिगत पंचायते हमको व्यक्ति नहीं समझती है। हमारे दुःख में औपचारिकताओं के अलावा काम नहीं आती है। लेकिन उनका जीवन भर दबदबा रहता है। उनके आंतक से हमें गलत निर्णय करने पड़ते है। वे हमारे मन में सदैव भूत की तरह डराती है। हमारे कभी हाल नहीं पूछती है। हमारा आजादी छिनने में उन्हें मजा आता है। वे हमारे प्रत्येक सार्वजनिक कर्म को नियन्त्रित करते है।
हम खुश कब रहे वह भी वे तय करते है। त्यौहार मनाने की विधि व साधन उनके अनुसार होते है। हमारे जीवन में कई बार लगता है कि हम ही अनुपस्थिति है। शेष वे सब है जो न होने चाहिए यह हमारी पराधीनता नहीं तो ओर क्या है।
क्या शीवजी की तरह जहर पीना ही हमारी नियति है। जातिगत समाज धर्म के नाम पर हैवानियत करते हैं। चन्द गुण्डे समाज का नेतृत्व कर व्यक्ति को तुच्छ बना देते है, जबकि व्यक्ति के बिना समाज हो नहीं सकता है। समाज की ठोस इकाई व्यक्ति है। समाज एक कल्पना है। जबकि व्यक्ति एक यथार्थ है। समुह अपने सदस्यों के बल पर इतराता है। सदस्यों के अभाव में समाज हो नहीं सकता है।
मानव समाज जरुरी है, जातिगत समाज गैर-जरुरी है। संगठित रखने, पवित्र रखने व परम्पराओं के नाम पर जातिगत समाज रोज जहर पीलाता है। हम उसके कलपूर्जे बन जाते है। व्यक्तिगत आजादी समाप्त है।
दूध देने वाली गाय की बात सहनी पड़ती है। पश्चिम में जैसा कि कहते है कि मुफ्त में कोई भोजन नहीं कराता है। जीवन में समाज बहुत कुछ सीखाता है, देता है तो थोड़ा जहर भी पीलाता है। यह सब जीवन का क्रम है।
जितना बच सकते है, बचो। वरन् जहर को गले से नीचे मत उतरने दो। अपना जीवन अपनी चाल से चलो। अपनी समझ बढ़ाओं। मौन हो जाओ, नदी में उतरो, लेकिन भीगो मत। संसार में रहना पड़ता है, इसे बदलना मुश्किल है। अपने बच के निकल जाओ। छोटी सी जिन्दगी है, यह भी निकल जायेगी।

मरने के लिए नहीं, जीने के लिए( तनाव मुक्त होने ) जहर पीओं&rdquo पर एक विचार;

  1. क्षमा कीजिये अगर मेरी सोच नकारात्मक लगे. ज़िन्दगी इतनी छोटी भी नहीं कि यूँ ही निकल जाये. ये तो रोज़ रोज़ नाकों चने चब्वाती है और उन अपनों द्वारा शोषित (हर प्रकार से), जो हमारा सम्मान नहीं करते, रोज़ मृत्यु से कम भी नहीं. फिर भी आपका ब्लॉग एक आशा तो जगाता है.

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