अन्तर्मन में चलते द्वन्दों का सामना कैसे करें ?

वास्तव में हम मन में चलते व्यर्थ के विचारों से परेशान है । प्रेम, शान्ति, माधुर्य और आनन्द को विचारों ने घायल कर रखा है । अन्यथा जीवन में कोई परेशानी नहीं है ।
हमारे मन के भीतर अंहकारी दुर्योधन बैठा है, जो सदैव दुश्चक्र रचता रहता है। भीतर बैठा स्वार्थ का शकुनि हमें नचाता हैे। हमारे मन के भीतर एक दुःशासन भी बैठा हुआ है जो अवसर मिलने पर द्रोपदी को नंगा करता रहता हैं। हमारे मन का रावण कई बार सीता का अपहरण करता है। हमारे भीतर बैठा कंस अपनी रक्षा के लिए दूसरों के साथ अत्याचार करता रहता हैं। कंस अपने भांजे कृष्ण को जन्मते ही मारना चाहता है , उसी तरह हम अपने स्वार्थ के लिए अपनो को मारने के लिए तत्पर है। भीतर बैठा शिशुपाल अपने घमंड को स्थापित करने दूसरों को अनवरत सताता हैं।

जीवन के बाहययु़द्ध में तो अन्ततः हार ही होती हैं। विश्वविजेता सिकन्दर तक बाहययुद्ध में हारा- हम क्या चीज हैं? पौराणिक कथा के अनुसार ययाति एक हजार वर्ष जीकर भी तृृृप्त न हुआ। उसकी इच्छाऐं पूरी न हुई । कुरुक्षेत्र भूलोक में कहीं बाहर हैं या नहीं, मैं नहीं जानता लेकिन हमारे मन में निश्चित हैं। इसे देख सकता हूं। महाभारत का युद्ध ऐतिहासिक हैं या नहीं, मैं नहीं जानता, लेकिन मन में चलने वाली महाभारत को मैं रोज देखता हूं। यहां कौरव-पाण्डवों का युद्ध हुआ की नहीं, यह घटना ऐतिहासिक हैं या नहीं, मैं नहीं जानता। परन्तु हमारे मन में रोज महाभारत लड़ी जाती हैं। विषय वासना व सत्य के बीच, भलों व बुरे के बीच, सत्य -झूठ के बीच, काम व अकाम के बीच, धर्म व अधर्म के बीच युद्ध जारी हैं। अन्यायी दुर्योधन व धर्मात्मा युधिष्ठिर मन में रोज लड़ते रहते हैं। यह करुं या नहीं, इधर जाए या नहीं, इस तरह जीउं या नहीं, यह उचित हैं या अनुचित का विश्लेषण मन में चलता रहता हैं।
कृष्ण द्वारा अर्जुन का बताया मार्ग गीता में है । जीवन में ’’जो है’’ उसको स्वीकारते हुए उसका पूर्ण होश से सामना करो । निर्लिप्त भाव से ’’जो है’’ उसका सामना करोें । गीता कहती है अपने अधिकारों के लिए लडाई भी जायज है ।

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