उत्तरी भारत में होली पर बच्चे की ढून्ढ क्यों करतेहै?

प्राचीन कथानुसार राजा पृथु के समय कुटिल ढुन्ढा नाम की एक राक्षसी थी जो बच्चों को परेशान करती थी,चुराया करती थी,उसके भय से बच्चे बीमार हो जाते थे एवं वह उन्हे खा जाती थी । इस कारण बच्चे उससे बहुत डरते थे।उसे वरदान प्राप्त था लेकिन शिव के शाप के कारण बच्चो की शरारत से मुक्त नही ंथी।वह नकारात्मकता का प्रतीक थी ।उससे सुरक्षा हेतु तत्समय के राजपुरोहित ने एक उपाय सुझाया था ताकि बच्चे उसके झांसेमें न आए । फाल्गुन मास की पूर्णिमा को समूह में बच्चे जब किलकारियां करते हुए उसके पास जाते है तो वह अप्रभावी हो जाती है ऐसे में  बच्चे उसे चिल्लाते हुवे जला देते है।इस तरह बच्चे भय से मुक्त हो जातेहै।इसलिए होली के दिन बच्चों को अग्नि के चारों ओर समूह में शोर करते हुवे घुमाया जाता है । इसी प्रक्रिया को ढून्ढ कहा जाता है अर्थात् राक्षसी ढुन्ढा के डर को बच्चों के मन से निकालने हेतु ढून्ढ की जाती है ।वैसे ही नकारात्मकता अर्थात् राक्षसवृति से बच्चों को मुक्त रखने के लिए ढून्ढ की जाती है ।असद को पराजित कर सदवृति को स्ािापित करने हेतु होली मनाते है ।प्रहलाद अर्थात् सत्य की जय होती है । इसीलिए ढंूढ होली के दिन मनाई जाती है ।
यह बच्चो ंको निर्भय बनाने का त्यौहार है । बच्चों के मन में बैठे डर को भगाने हेतु मनाया जाता है ।इस तरह  यह अभय को सिखाने का त्यौहार है । नवजात को जीवन से परिचय कराने काअवसरहै । पुराने समय मेंबच्चे के जन्म की खुशी भी ढून्ढ पर ही मनाई जाती है । तब   जन्मदिन नही ंमनाते थे।

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2 विचार “उत्तरी भारत में होली पर बच्चे की ढून्ढ क्यों करतेहै?&rdquo पर;

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