रिश्ते का मनोविज्ञान, आधार एवं प्रगाढ़ बनाने के उपाय

हम सामाजिक प्राणी है अतः रिश्तों में ही जीते है। पशुओं में रिश्ते नहीं होते। इनसे ही जीवन खिलता है। व्यक्ति अपने जीवन के लुत्फ़ इन्हें व्यवस्थित करके ही उठा सकता है।
सम्बन्ध शब्द सम और बन्ध दो शब्दों से मिल कर बना है जिसका अर्थ है कि समान सम्बन्ध यह विषम बन्ध या विषमय बन्धन न हो। हम रिश्ते में बन्धे है इन्हें रिसते हुए घाव न बनाएँ।
हमें रिश्तों को गहरा करने के लिए परस्पर गहरी समझ पैदा करने की जरुरत है। एक दूसरे को समझने की जरुरत है। इसके अभाव में गलतफमियाँ पैदा होती है। परस्पर धारणाएँ, लक्ष्य व सोच को समझने की जरुरत है। ताकि दूसरे को उचित सम्मान दिया जा सके। ताकि हमारा व्यवहार दूसरे को चुभे नहीं। सामने वाले के व्यवहार विशेष के पीछे क्या कारण था, कहीं कोई संवाद की कमी तो नहीं थी, या कोई मजबूरी तो नहीं थी। रिश्तांे की बुनियाद में प्रेम होता है। प्रेम ही सत्य है। उच्चता का भाव व अलगाव का भाव से अपनत्व घटता है।

 रिश्तों से हिसाब निकल जाए तभी रिश्ते कामयाब होते है। जब तक रिश्तोें में हिसाब है, तब तक वे लौकिक रिश्ते है। कामचलाउ है, उनसे बदबू आने की गुंजाइश है।

जिनके जीवन में प्रेम नहीं होता वे दूसरो को प्रेम नहीं दे सकते है। जिनको अभिनय में, चतुराई में विश्वास हो वे उसे नहीं दे सकते है। तभी तो कहा जाता है कि जीवन एक गुन्ज की तरह है, वहीं वापिस लौटता है जो हम उसे देते है।

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