अवचेतन का जादू :काम-वासना का शिकंजा

मेरे भीतर अभी भी कामदेव जीवित है। मैंने उनका सामना कई तरह से किया। काम-भोग को देखा, भोगा लेकिन प्यास अभी भी कायम है। अवचेतन का प्रभाव  गहरा होता  है।
यह आग अभी तक क्यों दहक रही है। किशोर अवस्था में जैसी प्यास थी, नारी जितनी अच्छी लगती थी आज भी उतनी ही आकर्षित करती है। चुपके से नारी, उसके उभारों को देखना, उसके अन्तः वस्त्रों कोे देखना अभी भी मन को अच्छा लगता है। काम को उत्तेजित करने वाले व काम सम्बन्धी बातों में अभी भी रस मौजूद है। नैसर्गिक माँग अनैसर्गिक ओर हो जाती है, कई बार। आखिर यह मन कब तक यूं ही भटकता रहता है?
इससे उसमें कुछ नया न मिलता है, फिर भी चाह मरती नहीं है। वही प्रयोग बार-बार होता है। भोगने के बाद कुछ घंटे तृप्ति तो रहती है। फिर कुछ समय बाद वासना अंगड़ाई लेती है। उपलब्ध में कमी नजर आती है व अप्राप्त आकर्षित करती है। यह खेल यथावत जारी है। जबकि ओशो को समझने के बाद भावनाओं का दमन अधिक न किया। जागृत रहने का प्रयत्न किया। फिर भी मन से वासना न गई।
शायद मैंने शर्तों पर सोचा है। ऐसी सुन्दर है, इतनी वफादार हो, पूर्व समर्पित हो तभी पूर्ति होगी। अन्यथा प्राप्त में कमी निकाल कर उसे बेकार कर देता हूँ व कहीं ओर से पूर्ति का सपना देखता हूँ। कई बार अपनों से शिकायत नहीं, फिर भी गैर मन को सुहाते है। मन कभी प्रयोग करना चाहता हूँ। कभी निकटता आकर्षित कर लेती हूँ तो कभी मौके का लाभ देखता हूँ।
शरीर के तल पर मिलन से मन का तल तृप्त नहीं होता। विचार के तल पर मिलन चाहिए। प्रेमपूर्ण चित्त नहीं है। आध्यात्मिक तल पर प्रेम को जाना नहीं है। इसलिए कामुकता जीवन से गई नहीं है।
समाजिक वर्जना ने सेक्स ओबशेसन पैदा किया है। सेक्स को दबाने के क्रम वह मरा नहीं बल्कि जहरीला हो गया है। यह जहर मुझे बेहोश करता है व मादाएं मुझे लुभाती है। सजगता से जीवन यापन नहीं कर पाता हूँ।
अधुरा भोग प्सास मिटाता नहीं है। पूर्णता में भोगने का समग्र मन न था। अर्थात् मैं समर्थ न था। विचारों के साथ भोगा जो तृप्त न हुआ। तभी तो भयभीत हूँ, खण्डित हूँ, अधुरा हूँ,एवं अप्रामाणिक हूँ। मूच्र्छा में जीने के कारण समग्र भोग न पा सका।
मैं सिद्धान्त, शास्त्र एवं विचारों से बंधा हुआ हूँ। अतः सेक्स को सूक्ष्म रूप से अचेतन रूप से दबाता रहा हूँ। एक तरफ नीति शास्त्र के बंधन है, तो शिक्षा के ताप अपनी जगह पर है।
मैं भीड़ से, समाज से, दूसरो से प्रभावित होता हूँ। उनसे डर कर सेक्स को दबाता रहा हूँ। सेक्स पर परिवार, पड़ौसियों की मर्यादा के नियम है। उनकी बुद्धि से भी चलता हूँ। मैं अकेला नहीं हूँ। सामाजिक रीति-रिवाज, प्रचलन, फैशन, कला सब सेक्स के विरुद्ध है। एक तरह से उससे नाराज होना लड़ना ही है। मैं सेक्स से बंध गया क्योंकि मैं सेक्स को पराजित करना चाहता हूँ। यह लड़ाई क्या सेक्स को भाव नहीं दे रही है?
विज्ञापनों से प्रभावित मन भटकता है। बाजारवाद मन को वासना में ले जाता है। बुद्ध ने इसी कारण वासना को दुष्पूर कहा है। यह पूरी नहीं होती। ऐसा इसका स्वभाव है। जबकि उपनिषद् कहते है भोगो तो छुटेगा। अर्थात् मैं इस ऊर्जा को समझ न पाया। इसके नियमों को पहचान न सका।
सेक्स में समय-शून्यता, शरीर-शून्यता व अहं-शून्यता की झलक मिलती है। यह झलक मैं बार-बार लपकना चाहता हूँ।
मैं प्रेमपूर्ण नहीं हूँ। मेरा मन घृणा, ईष्र्या, चिन्ता से भरा है। इसलिए मैं कामूक हूँ।
मेरी दृष्टि काम के प्रति सही नहीं रही। विरोध की दृष्टि से काम बढ़ा। मैंने उसे सहज नहीं लिया। उसे दुष्टमन समझा। इससे काम को बल मिलता रहा।

8 विचार “अवचेतन का जादू :काम-वासना का शिकंजा&rdquo पर;

  1. शरीर के तल पर मिलन से मन का तल तृप्त नहीं होता। विचार के तल पर मिलन चाहिए। प्रेमपूर्ण चित्त नहीं है। आध्यात्मिक तल पर प्रेम को जाना नहीं है। इसलिए कामुकता जीवन से गई नहीं है।……. मिलन के लिए कोई चाहिए. लेकिन जहां कोई और की आवश्यकता है वहाँ तृप्ति कहाँ ?

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