मन की तीसरी विशेषता तर्क आधारित सोचना एवं इसे अपने पक्ष में करें

मन की तीसरी विशेषता तर्क को महत्त्व देना है। वह तर्क से ही समझाता व समझता है। तर्क द्वारा समग्र को नहीं समझा जा सकता है। क्योंकि तर्क भी वस्तुओं को खण्डित करता है। तर्क मन की ही ईजाद है। उसके द्वारा उसके पार सोच नहीं पाते है। तर्क शास्त्र ऐसा ज्ञान है ‘‘जो है’’ उसको नहीं सिद्ध करें एंव ‘‘जो नहीं है’’ उसको प्रमाणित कर दे। अर्थात् यह वायवीय है। बातुनी है, उपरी-उपरीे है। इसको जीवन में समझने का आधार नहीं बनाया जा सकता। जैसे की प्लेट में रखे दो अमरुदों को तर्क तीन सिद्ध कर सकता है। एक पहला जो है, व दूसरा दो नम्बर का अमरुद। अब एक एवं दो जोड़ो-यह तीन होता है। जबकि प्लेट में दो अमरुद ही है। तर्क द्वारा तीन अमरुद सिद्ध किये जा सकते है लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं होता है।
लेकिन मन के अधिन व्यक्ति को यह बात तो गले नहीं उतरती है। हमारी आदत तर्क प्रधान हो गई है। जबकि तर्क भी एक साधन है समझने-समझाने का। वह भी सब कुछ नहीं है। जिसके कारण जीवन को गहरे सत्यों को हम समझ नहीं पाते है। तर्क ही ज्ञान की कसौटी नहीं है। तर्क से सत्य को पकड़ा नहीं जा सकता। लेकिन तर्कातीत को ख्याल में लेने में मात्र तर्क सहायह है। जैसे तबला बजाने वाला बजाने के पूर्व हथोड़े से तबला ठोंकता है, वह संगीत नहीं है। वह संगीत की पूर्व तैयारी है। इस कारण जीवन में अन्धेरा छिटकता नहीं है।
मन का स्वभाव ही ऐसा है। फिर इसके कहने पर चल कर हम दुःखी होते है व कर्म भाग्य आदि को दोष देते रहते है। अरे! मन रूपी में नाव में ही छेद है तो भवसागर कैसे पार लगेगा। इस नांव में तो एक नहीं तीन-तीन बड़े छेद है। मन की इस स्वभाव, विशेषता व इसकी कुशलता को ध्यान में रख कर निर्णय लें।

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