मन की पहली विशेषता विचार करना

मन की पहली विशेषता विचार करना है। हम अपनी जीवन यात्रा में हर चीज का सामना विचार से करते हैं। वैसे विचार बाह्य जगत में/सांसारिक उन्नति में जरुरी है। उसका अपना जीवन में महत्त्व है। उससे मैं इन्कार नहीं करता हूँ। लेकिन आन्तरिक जगत में, निराकार के जगत में विचार समस्याएँ पैदा करता है। भौतिक क्षेत्र में तो फिर भी विचार सहायक हो जाते है लेकिन भाव जगत में, निराकार के क्षेत्र में, चेतना के सम्बन्ध में विचार आधारित निर्णय भटकाने वाले होते है। हमें विचार को छोड़ किसी अन्य साधन/दृष्टि का पता नहीं है।
विचार की अपनी सीमाएं होती है जिसे हम भूल जाते है। विचार वस्तु को खण्डित कर देखता है। वह समग्र को एक साथ देख नहीं पाता है। अतः कई बार वस्तुओं के पक्ष को देख कर उन्हें दो में बांट देता है-प्रेम-घृणा, लाभ-हानि, हार-जीत, मेरा-तेरा, यह-वह आदि। इस तरह देखने से ये सब समस्याएं हो जाते है। क्योंकि प्रेम-घृणा एक ही भाव के दो रूप है, दो किनारे है। प्रेम और घृणा दों चीजें नहीं है। दोनों के परमाणु एक ही है। कभी पूरा प्रेम नहीं होता, न ही पूरी तरह हम घृणा करते है। जब हम प्रेम करते है तो साथ घृणा भी जन्मती है, जिसे विचार तत्समय देख नहीं पाता। मानें कि यह एक से सौ तक की मात्रा है। यही विचार की सबसे बड़ी सीमा है, कमजोरी है। तभी तो जिससे प्रेम होता है उसी से हमारी लड़ाई भी होती है।
वैसे ही जीत-हार भी दो नहीं होते है। हर जीत में कुछ हार होती है। इसी तरह हर हार में कुछ जीत भी छिपा होती है जिसे विचार देख नहीं पाते है। पाना-खोना भी पूर्ण नहीं होते है। हर खोने में कुछ पाना होता है। पाने में कुछ खोना छिपा रहता है। अतः विभाजित कर देखने के कारण समझ कमजोर हो जाती है, अधुरी रह जाती है। इस कारण हम सही निर्णय नहीं कर पाते है।
विचार वस्तु को खण्डित कर देखता है अर्थात् वस्तु एवं भाव का एक ही पक्ष देखता है अर्थात् समग्र को देख नहीं पाता हैै। ऐसे में हम अधुरे ज्ञान से निर्णय कर आगे बढ़ते है जो बाद में वहीं फैसले गलत लगते है। तभी जो कभी मित्र लगता है वहीं कभी वही दुश्मन दिखता हैै। आज तक जो अपना है वह कल पराया दिखता है। जबकि विचार की सीमा को ध्यान में रखे तो पछताना कम हो सकता है। बुद्धि तो उधार विचारों को ही समझने की भ्रान्ति में पड़ जाती है। बुद्धि की संवेदना सतही होती है। सागर के अन्दर का अन्तस्तल उपरी लहरों को पता नहीं होता है।

 ( To be continued…..)

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मन की पहली विशेषता विचार करना&rdquo पर एक विचार;

  1. जैन जी मन का कार्य है मनन चिंतन करना संकल्प विकल्प करना उसके पश्चात करना चाहिए या नहीं अच्छा है या बुरा इसका निर्णय तो बुद्धि करती है. मनन चिंतन करना जितना व्यवहारिक जगत में आवश्यक है उतना अध्यातमिक जगत में भी मनन चिंतन करने पर जो अच्छा है उसे अपनाना जो बुरा है उसे छोड़ना ,इसी से तो विवेक वैराग्य और शान्ति प्राप्त हो सकती है

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