एलोपैथिक दवाएँः मित्र या शत्रु

औषधियां,इन्जेेक्शन इत्यादि हमारे सुखी जीवन के लिए अभिशाप है।

                                                                                                 -एन्साइक्लोपिडिया आॅफ अमेरिका
सभी विज्ञानो में औषधि विज्ञान सबसे ज्यादा अनिश्चित है।जिस प्रकार दीमक लगी लकड़ी पर रंग-रोगन करने से मजबूती नहीं आ सकती,थोड़ा-सा स्पर्श होते ही टूट जाती है। कचरे को इकट्ठा रखने से उसमें उफान,सडान, बदबू एवं रूकावट आने की समस्या खडी हो जाती है, ठीक इसी प्रकार दवाए शरीर की प्रतिरोधक क्षमता क्षीण करके कचरे को तो साफ नहीं करती, दीमक को तो नहीं हटाती पर रोगों के कारणों को मिटाने की जगह उसको दबाने अथवा रोग को अन्य रूप में प्रगट करने का मार्ग खोल देती है।
आज हमारे जीवन में दवाओं का इतना महत्वपूर्ण स्थान बन गया है कि थोड़ा सा सिर दर्द अथवा शरीर में थोडी-सी अस्वस्थता आई नहीं कि तत्क्षण हम गोली ले लेते हैं । दर्दशामक ओैषधि दर्द को दूर करने के लिए ली जाती है पर याद रखें कि इन दमनकारी औषधियों का प्रभाव विनाशकारी है। तत्काल तो इनसे लाभ होता है पर दीर्घकाल में इनसे हानि अधिक होती हैै। ये औषधियां हमारे शरीर के स्नायुओं को कमजोर करती हैं परिणाम स्वरूप हमारी संवेदन शक्ति कम होती है। तब हमारी ऐसी असहाय स्थिति हो जाती है जैसे कि किसी कारखाने में आग लगे और उसकी चेतावनी के रूप में घंटी के जरिए उसके मालिक को सूचित किया जाए, पर मालिक को जरा भी असुविधा पसन्द नहीं इसलिए वो घंटी का तार ही काट डाले। जिस से घंटी बजना तो बंद हो जाता है, पर आग रुकती नहीं और कारखाना भस्मीभूत हो जाता है। इस तरह दवाओं के प्रभाव से हमारी जीवन शक्ति को नुकसान पहुंचता है और शरीर अंदर ही अंदर विषाक्त होकर खत्म हो जाता है।
वास्तव में दवाओं का विचार ही भ्रामक और अस्थाई पाये पर आधारित है। सर कपूर कहते है-औषधि-विज्ञान की उत्पति मिथ्या,कल्पना और दिन प्रतिदिन बढती मृत्यु पर हुई है। दवा का विरोध करना इसलिए आवश्यक है कि जैसे ही एक रोग की दवा लेने से उसके लक्षण दबते हैं तो दूसरे जटिल रोग उसके विकल्प में तैयार हो जाते है। दवा अपने जहरीले प्रभाव के द्वारा सिर्फ रोगो के लक्षणों का दमन करती है ,परन्तु बुनियादी रूप से जड़ को प्रभावित नहीं करती है।
दवाओं की शक्ति प्रकृति की शक्तियों से अधिक नहीं होती है। हम अस्वस्थ होते हंै डाक्टरों की शरण मे जाते हंै व दवाये लेते हैं। इसके बजाय हमें प्राकृतिक शक्तियों पर भरोसा कर सावधानी बरतनी चाहिए। औषधि मार्ग जो हमें रोगों के चुगंल में फंसाता रहता है और जीवन को तकलीफ देह बनाता है, उसे न अपनाएँ।

                                                                          ( मेरी आने वाली पुस्तक “जियो तो ऐसे जियो ‘ से )

एलोपैथिक दवाएँः मित्र या शत्रु&rdquo पर एक विचार;

  1. बिल्कुल सच कहा आपने । और इससे भी बढकर आज एलोपैथी में नकली दवाइयों की जितनी भरमार हो गई है वो तो ज़हर का काम कर रही हैं । ज्ञानवर्धक और जरूरी पोस्ट

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