इस हाथ को कौन हिलाता है? हम कर्ता है या दृष्टा है।

जब हाथ हिलता है तो हम हिलाने वाले है या दृष्टा है? मेरा हाथ हिलता है तो मैं कहता हूँ कि मैं इसे हिलाता हूँ। जब लकवा हो जाए और हाथ न हिले तो मैं कहता हूँ कि लकवा हो गया। अरे! जब हिलता है तब मैं हिलाता हूँ एवं जब नहीं हिलता है तो मुझे लकवा हो गया है। हिलाता मैं हूँ एवं नहीं हिलता है तो लकवा कारण है। अरे हम कहाँ है? यह दोहरी चाल। युक्ति देखें। हम कर्ता नहीं दृष्टा है।

इस हाथ के हिलाने में ब्रह्याण्डीय शक्तियों का साथ है। नियति की भूमिका है। शरीर को मन द्वारा आज्ञा मिलती है। आकाश यानि हिलाने को जगह देता है, पृथ्वी वह शक्ति देती है जिससे हाथ बना है, अग्नि जो इसमें बाहर व अन्दर मौजूद है वह भी जिम्मेदार है। पानी नामक तत्व भी बराबर सहयोगी है। वायु की भी इसमें भूमिका है। निर्वात में यह नहीं हिल सकता है। किसी समय विशेष में हिलता है अर्थात् काल भी इसमें जिम्मेदार है। अर्थात् पंचभूत/तत्व जिम्मेदार है। जबकि अहं कहता है कि मैं हिलाता हूँ। सही मान में हम दृष्टा है। चेतन तत्व ज्ञायक है। वह जानने देखने वाला है। पदार्थ अपने गुणानुसार वर्तन करते है।

हम जीवन भर यही गलती दुहराते है। जो कार्य होता है उसे तो हम करते है व जो नहीं होता है उसके लिए दूसरे दोषी है। यहाँ पुरुषार्थ या कर्म का विरोध नहीं है। हमें उसके सच्चे स्वरूप को समझना है।

जीवन में जो प्राप्त है उसका मूल्य समझना है। अध्यात्म या अस्तित्व के प्रति कृतज्ञ होना है। उसके प्रति जागना है। यह सत्य समझते ही जीवन का रहस्य समझ में आता है। अस्तित्व की चाबी हाथ में आती है। तभी हम सही रूप में कर्म को कर पाते है। अन्यथा अहं के कारण दुःख उठाते है। इसमें नियति की भूमिका से इन्कार नहीं किया जा सकता है। यही तो गीता का निष्काम कर्म है, पूर्णता में ज्ञायक बनकर कर्म करना।

जो मिला है वह बेशकिमती है। उस पर हमारा कोई दावा नहीं है। वह उसकी कृपा है, उसकी व्यवस्था है। उसके प्रति हमें शिश झुकाना है। स्वयं को उसका अशं अनुभव करना है। उसकी लीला को गले उतारना है। उसकी कृपा को, तन्त्र को, जान कर उसके साथ होना है। जीवन जीने का आनन्द तभी आता है। उसके खिलाफ जाकर हम जी नहीं सकते है। स्वयं को लड़ते हुए जीना कोई जीना नहीं इसके अनुरूप ढ़लना है। समर्पण भी एक मार्ग है। स्वयं के अहं को हटाते ही सब कुछ स्वतः ही ठीक होने लगता है। स्वीकार भाव वर्तमान में ले आता है। अस्वीकारना भटकाव है, अन्यथा सोचना स्वयं से भागना है। अपने से दूर जाना है।

इस ज्ञान का, सत्य का शब्दों में वर्णन करना या शब्दों मेें समझना व्यर्थ है। इस ज्ञान का ऐहसास करना है। इसके साथ जीना है। विद्धानों की तरह इसका व्यापार करने से बचो। इसका अन्य उपयोग हमें भ्रमित करता है। इस तत्वज्ञान के साथ जीना है। साधनागत धम को सिद्धान्त बना कर धर्मगुरु बनना भटकना है। शब्द, विचार, कर्म पर उपदेश देना कठिन है। इस परम ज्ञान को जीवन में उतारना है, व्यवहार में लाना है। इसका व्यापार नहीं करना है, नाम नहीं कमाना है। इस गुढ़ज्ञान को भी सिद्धान्त बनाकर कुन्डा किया जा सकता है। इसके मात्र मस्तिष्क में होने पर यह बेकार है। इसकी सार्थकता इसको जीने मंे है। विचारणा में नहीं, उसके साक्षी होने में है।

यह जीवन उसका है। सब उसका विस्तार है। उसी से संचालित है। क्षुद्र खाली विचार है। भटकाव है, भुलाना है, मन की उड़ान है। एक तरगं है। इससे कुछ नहीं होता है। समुद्र में उठने वाली तरंगो के सामने इसकी क्या बिसात है?
हमारा जीवन समुद्र में उठती एक तरगं के अतिरिक्त कुछ नहीं है।
ऐसे प्रश्नों का उत्तर ‘हाँ’ या ‘ना’ में नहीं दिया जा सकता है। सत्य इन दो छोरों के बीच कहीं होता है।

इस हाथ को कौन हिलाता है? हम कर्ता है या दृष्टा है।&rdquo पर एक विचार;

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