जवारे का रसः बीमारी में अमृत एवं प्राकृतिक प्रतिरोधक शक्ति जगाने हेतु

गेंहूं के पौधे में ईश्वरप्रदत्त अपूर्व गुण है। हम लोग बारहों मास भोजन गेहूँ का प्रयोग करते हैं, पर उसमें क्या गुण हैं, यह हम नहीं जानते रोगनाशक हैं।
पिछली सदी में अमरीका की एक महिला डाक्टर एन. विगमोर ने गेहूं की शक्ति के सम्बन्ध में बहुत अनुसन्धान तथा अनेकानेक प्रयोग करके एक बड़ी पुस्तक लिखी है, जिनका नाम है Why Suffe? Answer…Wheat Grass Manna उन्होंने अनेकानेक असाध्य रोगियों को गेहूं के जवारे का रस देकर उनके कठिन से कठिन रोग अच्छे किये हंै। वे कहती है कि संसार में ऐसा कोई रोग नहीं है जो इस रस के सेवन से अच्छा न हो सके। कैंसर के ऐसे बड़े-बड़े रोगी उन्होेंने अच्छे किये हैं, जिन्हें डाक्टरों ने असाध्य समझकर जवाब दे दिया था और जो मरणप्रायः अवस्था में अस्पताल से निकाल दिए गए थे। यह ऐसी अदभुत हितकर चीज है। उन्होंने इस साधारण से रस से अनेकानेक भगंदर, बवासीर, मधुमेह, गठियाबाय, पीलियाज्वर, दमा, खांसी वगैरह के पुराने से पुराने असाध्य रोगी अच्छे किये हैं। बुढ़ापे की कमजोरी दूर करने में तो यह रामबाण है। भयंकर फोड़ों और घावों पर इसकी लुगदी बाँधने से जल्दी लाभ होता है। अमेरिका के अनेकानेक बड़े-बड़े डाक्टरों ने इस बात का समर्थन किया है। अनेक लोग इसका प्रयोग करके लाभ उठा रहे हैं।

जवारे का रस के बनाने की विधि
आप सात बांस की टोकरी मंे अथवा गमलों मंे अच्छी मिट्टी भरकर उन मंे प्रति दिन बारी-बारी से कुछ उत्तम गेहूँ के दाने बो दीजिए और छाया मंे अथवा कमरे या बरामदे मंे रखकर यदाकदा थोड़ा-थोड़ा पानी डालते जाइये, धूप न लगे तो अच्छा है। तीन-चार दिन बाद गेहूँ उग आयेंगे और आठ-दस दिन के बाद 6-8 इंच के हो जायेंगे। तब आप उसमें से पहले दिन के बोए हुए 30-40 पेड़ जड़ सहित उखाड़कर जड़ को काटकर फेंक दीजिए और बचे हुए डंठल और पत्तियों को धोकर साफ सिल पर थोड़े पानी के साथ पीसकर छानकर आधे गिलास के लगभग रस तैयार कीजिए ।
वह ताजा रस रोगी को रोज सवेरे पिला दीजिये। इसी प्रकार शाम को भी ताजा रस तैयार करके पिलाइये आप देखेंगे कि भयंकर रोग दस बीस दिन के बाद भागने लगेगे और दो-तीन महीने मंे वह मरणप्रायः प्राणी एकदम रोग मुक्त होकर पहले के समान हट्टा-कट्ठा स्वस्थ मनुष्य हो जायेगा। रस छानने में जो फूजला निकले उसे भी नमक वगैरह डालकर भोजन के साथ रोगी को खिलाएं तो बहुत अच्छा है। रस निकालने के झंझट से बचना चाहें तो आप उन पौधों को चाकू से महीन-महीन काटकर भोजन के साथ सलाद की तरह भी सेवन कर सकते हैं परन्तु उसके साथ कोई फल न खाइये। आप देखेंगे कि इस ईश्वरप्रदत्त अमृत के सामने सब दवाइयां बेकार हो जायेगी।

गेहूँ के पौधे 6-8 इंच से ज्यादा बड़े न होने पायें, तभी उन्हें काम मंे लिया जाय। इसी कारण गमले में या चीड़ के बक्स रखकर बारी-बारी आपको गेहूँ के दाने बोने पड़ेंगे। जैसे-जैसे गमले खाली होते जाएं वैसे-वैसे उनमें गेहूँ बोते चले जाइये। इस प्रकार यह जवारा घर में प्रायः बारहों मास उगाया जा सकता है।

सावधानियाँ

  • ऽ रस निकाल कर ज्यादा देर नहीं रखना चाहिए।
  •  रस ताजा ही सेवन कर लेना चाहिए। घण्टा दो घण्टा रख छोड़ने से उसकी शक्ति घट जाती है और तीन-चार घण्टे बाद तो वह बिल्कुल व्यर्थ हो जाता है।
  •  ग्रीन ग्रास एक-दो दिन हिफाजत से रक्खी जाएं तो विशेष हानि नहीं पहुँचती है।
  •  रस लेने के पूर्व व बाद मंे एक घण्टे तक कोई अन्य आहार न लें
  •  गमलों में रासायनिक खाद नहीं डाले।
  •  रस में अदरक अथवा खाने के पान मिला सकते हैं इससे उसके स्वाद तथा गुण में वृद्धि हो जाती है।
  •  रस में नींबू अथवा नमक नहीं मिलाना चाहिए।
  •  रस धीरे-धीरे पीना चाहिए।
  •  इसका सेवन करते समय सादा भोजन ही लेना चाहिए। तली हुई वस्तुएं नहीं खानी चाहिए।

तीन घण्टे मंे जवारे के रस के पोषक गुण समाप्त हो जाते हैं। शुरु मंे कइयों को उल्टी होंगी और दस्त लगेंगे तथा सर्दी मालूम पड़ेगी। यह सब रोग होने की निशानी है। सर्दीं, उल्टी या दस्त होने से शरीर में एकत्रित मल बाहर निकल जायेगा, इससे घबराने की जरुरत नहीं है।
स्वामी रामदेव ने इस रस के साथ नीम गिलोय व तुलसी के 20 पत्तों का रस मिलाने की बात कहीं है।
कैलिफोर्निंया विश्वविद्यालय की शोध से प्रकट हुआ कि जवारे के रस में पी फोर डी वन नामक ऐसा ऐन्जाइम है जो दोषी डी एन ए की मरम्मत करता है। रक्त शोधन, यकृत से विषैले रयासनों को निकालने व मलशोधन मंे इसका बहुत योगदान है।डाॅ. हेन्स मिलर क्लोराॅिफल को रक्त बनाने वाले प्राकृतिक परमाणु कहते है। लिट्राइल से कैंसर तक को ठीक करने वाले तत्वों का पता लगा है। कोशिकाओं के म्यूटेशन को रोकता है। अर्थात् कार्सिनोजेनिक रसायनों जैसे बेन्जोंपायरीन को कम करता है। इससे कैंसर वृद्धि रूकती है। चीन में लीवर कैंसर इससे ठीक हुए है।

लगभग एक किलो ताजा जवारा के रस से चैबीस किलो अन्य साग सब्जियों के समान पोषक तत्व पाये जाते है।
डाक्टर विगमोर ने अपनी प्रयोगशाला मंे हजारों असाध्य रोगियों पर इस जवारे के रस का प्रयोग किया है और वे कहती हैं कि उनमें से किसी एक मामले मंे भी उन्हें असफलता नहीं मिली है।

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12 विचार “जवारे का रसः बीमारी में अमृत एवं प्राकृतिक प्रतिरोधक शक्ति जगाने हेतु&rdquo पर;

  1. गहूँ के जवारे के बारे में तो रामदेव बाबा ने भी बहुत कुछ कहा और बताया है मगर लोग माने तब ना बढ़िया जानकारी पूर्ण पोस्ट समय मिले तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है
    http://mhare-anubhav.blogspot.com/2011/09/2011.html

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