बच्चे को जन्म देने से पूर्व माता-पिता का प्रशिक्षण जरूरी -अंतिम भाग

इससे स्पष्ट है कि हमारे भीतर कुछ गड़बड़ है। हम मनोवैज्ञानिक रूप से आत्मनिर्भर, सहज व खुश नहीं है। हम अतीत या भविष्य में जीने वाले लोग है। हम सदैव विचारों में जीते है। तभी तो हमारी भावी पीढ़ी हमारी ही तरह अधुरी है। जैसाकि हम अपने पूर्वजों से बहुत आगे है, फिर भी भावनात्मक रूप से अधुरे , अविकसित व अपूर्ण है। हम अपने भीतर प्रसन्नता जो है उसे अन्दर न खोजकर बाहर खोजते है एवं भटकते रहते है। हम प्रेम व स्नेह तक दूसरों से माँगते है, वह भी उनसे जिनके स्वयं के पास प्रेम नहीं है। हम जानते बुझते हुए भी उन्हीं लीक पर चलने को विवश है-यह कहना गलत नहीं होगा।

नए इन्सान को जन्म देने के लिए हमें अपनी लीक छोड़नी पड़ेगी। स्वयं को बंधनों से थोड़ा मुक्त करना होगा। अपने पूर्वाग्रहों से बाहर आना होगा। अन्यथा सामाजिक क्रांति नहीं हो सकती। इस धरा पर हम जैसे ही पैदा होकर बच्चे भी दुःखी होते रहेंगे। हमें खुशी, प्रेम, मानवता, एकता पैदा करनी है तो कुछ चीजें बुनियादी रूप से बदलनी जरूरी है। हमारे माता-पिता ने जो गलती हमें पालने में की है उसको दोहराने की आवश्यकता नहीं है। हमें उन्हें नई जीवन शैली सीखानी चाहिए। हम जिन बातों से वंचित रहे है, उनकी कमी नई पीढ़ी को न हो। हम एक दूसरे के शिकार हुए है कम से कम हमारे बच्चे न हो। हमें जैसे पाला गया है हम वैसे ही अपने बच्चों को पालते है। हम बच्चों को वही तो सीखा सकते है जैसे हम है या जितना हमें ज्ञान है। हम देर-सवेरे अपने बच्चों को अपनी प्रतिलिपी बना
बच्चे को जन्म देने से पूर्व माता-पिता का प्रशिक्षण जरूरीदेते है। हाँ, वातावरण की भिन्नता से वह कुछ नई सूचनाएँ जरूर ग्रहण कर लेता है लेकिन जीवन मूल्य ,दृष्टि व व्यवहार का अनुकरण तो परिवार की तर्ज पर ही करता है।

माता-पिता जैसा घर में आचरण करते है बच्चे उनका प्रदर्शन बाहर कर देते है। जो माँ-बाप लड़ते रहते है बच्चे भी उनसे लड़ना सीख जाते है। जो दम्पत्ति शिकायतें करते है, नकारात्मक होते है उनके बच्चे नकारात्मक हो जाते है। बच्चे अनुकरण करने में बड़े प्रवीण होते है, वे सबसे ज्यादा परिवार से सीखते है। हम कहने से ज्यादा अपने व्यवहार से सीखाते है। हमारी आदतें, वृत्तियाँ, दृष्टि, कार्य करने के तरीके, सोचने के ढंग, प्रतिक्रिया करने के ढंग बहुत बारीकी से बच्चे देखते व अनुभव करते है।

़मेरी समझ से हमारे जीवन का यह सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। मैं अपनी पत्नी को सदैव डाँटता रहा हूँ कि तुमने बच्चे पैदा करने के पूर्व प्रशिक्षण नहीं लिया है इसलिए हम बच्चे ढंग से नहीं बड़े कर पा रहे है। माँ बनने के पूर्व जबकि इसके लिए मैं उसका बराबर दोषी हूँ। फिर भी पुरुष अंह स्त्री को जलील करता रहा। मुेेझे अनुभव के बाद समझ में आता है, कि मैं अच्छा पिता इसीलिए न बन सका क्योंकि मुझे अपनी जिम्मेदारियाँ का ज्ञान नहीं था। मैं अपने सपनों को पूरा करने का संघर्ष कर रहा था। तब मैं स्वयं व्यस्त था। तब मेरी प्राथमिकता मे बच्चों का लालन-पालन पीछे था। या बच्चों को पालना, पढ़ाना व सीखाने का विज्ञान मैं नहीं जानता था। न स्वयं होश में जीता था। अतः बच्चे को वही सिखाया जितना मुझे आता था। मेरे अधकचरे ज्ञान ने मेरे बच्चों को भी अधुरा इन्सान ही बनाया।

भविष्य में चुनौतियों बदल रही है, अतः बच्चों को नई तरह के संघर्ष करने होगे। उनकी मुश्किलें हमसे ज्यादा है। आने वाले समय की परेशानियाँ दूसरे तरह की होंगी। अतः उन्हें उसके लिए तैयार करने हेतु माँ-बाप को बदलना होगा। वैसे बच्चों को सिखाने का सरलतम तरीका माँ-बाप को वैसा आचरण कर सिखाना होगा। हमें पहले बदलने की जरूरत है। हम वही सीखा सकते है जैसे कि हम है। वरन् बच्चे माँ-बाप का झूठ, दोहरापन या विसंगति पकड़ने में कुशल होते है। वे माँ-बाप की कथनी-करनी के अन्तर को अच्छी तरह जानते है।

अनुशासन के नाम पर बच्चों से दादागिरी न करें। बच्चों की पीटाई अब अच्छी बात नहीं समझी जाती है। बच्चे बहुत नाजुक होते है, टोका-टोकी कर उनमें हीन भावना न पैदा करें।

इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप अपने बुजुर्गों पर गर्व कर सकते हैं। फर्क इस बात का पड़ता है कि वे आप पर गर्व कर सकते हैं या नहीं।

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