शिकायत करना स्वयं को बचाना है, असफलता कारक है

किताब-ए-मीरदाद में लिखा है कि कभी किसी चींज की शिकायत न करो। किसी चींज की शिकायत करना उसे अपने लिए अभिशाप बना लेना है। उसे भली प्रकार सहन कर लेना उसे उचित दंड देना है। किन्तु उसे समझ लेना उसे एक सच्चा सेवक बना लेना है।

शिकायत नहीं कर हमें उसे समझने की जरूरत है क्योंकि शिकायत करने से किसी समस्या का समाधान नहीं होता है। उल्टा शिकायत कत्र्ता की कमजोरी व बेवकूफी प्रकट होती है। वस्तु स्थिति का ज्ञान व्यक्ति को ऊँचा उठाता है। वस्तु स्थिति व तथ्यों को समझ लेने से समाधान की राह निकल सकती है। बोल कर शिकायत करने में, अपने को बचाने में बुद्धिमत्ता नहीं है। शिकायत षिकायत करने में सिर्फ अहम् का प्रदर्षन है। इसमें किसी का भला नहीं है। शिकायत को समझ कर उसे वरदान बनाएँ। घटना विषेष को शिकायत कर हम अभिषाप बनाते हैं। उसकी बजाय उसको समझ कर/सामना कर/समाधान कर वरदान बना सकते हैं।

षिकायत करने की मनोवृत्ति सफलता प्राप्ति में बाधक है। यह नकारात्मकता है। षिकायत करना अर्थात् किसी को स्वीकार नहीं करना है। दूध ढूल चुका है, जिसे अब समेटा नहीं जा सकता। उस पर रोना व्यर्थ है। शिकायत करना पलायन है। इसी तरह घटना घटने के बाद उसकी शिकायत करना निरी मूर्खता है, मात्र अहंकार है। अपने आपको श्रेष्ठ बताना है, स्वयं की कमजोरियों को ढ़कना है। शिकायत करने में हानि ही हानि है।

शिकायत करने में समझ व ऊर्जा का अपव्यय होता है। अपना मूड़ खराब करना है, वापिस अतीत में जीना है। यह एक तरह से नासमझी है। अर्थात् षिकायत करने में कोई लाभ नहीं है। अपने घावों में पुनः अगूँली डालना है। षिकायत करने से कोई बदलता नहीं है। न षिकायत करने वाला व न ही वह व्यक्ति जिससे षिकायत है। अतःशिकायत बाजी यह व्यर्थ की लीला है।शिकायत करना कई बार अपनी पोल खोलना है। अपने अच्छे मूड़ को खराब करना है। तभी समझदार व्यक्ति शिकायत नहीं करते है।

2 विचार “शिकायत करना स्वयं को बचाना है, असफलता कारक है&rdquo पर;

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