महावीर जयंती : कैसे पढ़े जैन शास्त्र ?

स्वाध्याय एक कला है। शास्त्रगत सत्य एवं परिणामों के आधार पर जैन शास्त्र मूलतः अनुयोग-पद्धति के आधार पर लिखे गये हैं। संसार के अन्य किसी भी धर्म के पास यह सुविधा नहीं हैं। जिनमत में मोटे रुप से शास्त्रों को चार अनुयोगों में बाँटा गया है। प्राथमिक भूमिका वाले अध्येता के लिए प्रथमानुयोग है। कर्मफल और लोकालोक(यूनिवर्स) की संरचना के जिज्ञासु के लिए करणानुयोग है। व्यवहारी श्रद्धालुओं के लिए चरणानुयोग है, जिसमें आचरण-संहिता निबद्ध है। तार्किक एवं अनुभवी के लिए द्रव्यानुयोग है।

How to read scriptures?

धर्म में जिनकी रुचि और तत्परता नहीं है ऐसे लोगों को आकर्षित करने के लिए प्रथमानुयोग है। यह कथानुयोग है, जिसमें अतिशयोकितपूर्ण भाषा एवं आलंकारिक शैली में पुराण आदि लिखे गये हैं। यही कारण है कि अनेक स्थलों पर प्रथमानुयोग कपोल-कल्पित प्रतीत होता है। अरे भाई, तीव्र कषाय-ग्रस्त जीवों को नैतिकता का पाठ पढ़ाने, उन्हें धर्म से परिचित कराने आदि के लिए चमत्कारिक कथन किये जाते हैं। अद्भुत रस से पाठक तत्काल प्रभावित होते हैं। पाप-पुण्य से जुड़ी कथाएँ धर्म-भीरुओं को नैतिकता सिखाती है; अतः ऐसी कथाओं में तथ्यों की सत्यता नहीं, बल्कि उनका प्रयोजन उपादेय होता है। प्रयोजन सत्य है, इसलिए घटनाओं की छानबीन व्यावहारिक नहीं है। शलाका पुरुषों के जीवन’वृत्तों में इतिहास न ढँढ़ कर, हमें उनके लक्ष्य पर ध्यान देना चाहिये। कवि एवं कथाकार को इतिहास की कुर्सी पर बैठा कर उनमें दोष ढँढ़ना बुद्धिमता नहीं है; इसलिए कथानुयोग का अध्ययन साहित्यिक विवेक के साथ करना चाहिये अन्यथा हमारी पुराण-सम्पदा भी आपको गप्पाष्टक लगेगी।

करणानुयोग का संबध कर्म-सिद्धान्त एवं भूगोल से है। वैसे यह तकनीकी अनुयोग अति जिज्ञासुओं के लिए है। यह पूर्णतः केवलज्ञान पर आधारित है; इसलिए छद्मस्यों (सांसारिक) के अनुभव इसे समझने में बाधा डालते हैं। इसमें तर्क-वितर्क से कोई निर्णय नहीं लिया जा सकता है। गुणस्थान, मार्गणा-स्थान आदि के अध्ययन परिणामों को स्थिर करते हैं। इनके अभ्यास से मोह-क्षय होता है। मोटे रुप में कहें तो यह बुद्धिजीवियों-का-अनुयोग है। द्रव्यानुयोग में प्रत्येक तथ्य के पीछे कोई-न-कोई कारण है; अतः इसकी गहरी खोज-बीन आज बहुत आवश्यक है।

चरित्र की पवित्रता बनाये रखने के लिए बाह्य साधनों का निरुपण चरणानुयोग में किया जाता है। इसमें श्रावक एवं साधुओं की आचरण-संहिता का विस्तृत विवेचन हुआ है। व्रतों का स्वरुप एवं वर्णन, भक्ष्य-अभक्ष्य खाद्याओं की सूची, अतिचारों के वर्णन, एवं संयम को प्राप्त करने की प्रविधि इस अनुयोग की मुख्य विषय-वस्तु है। स्वेच्छारिता को नियन्त्रित करने के लिए निरुपित अनेक बातें आज के वैज्ञानिक संदर्भो में ठीक न भी बैठती हों तो भी इन्हें ग्रहण करना चाहिये। भला जैन आचरण-संहिता संसार-वर्धक कैसे हो सकती है? स्वास्थ्य-विज्ञान के विरुद्ध हुए एकाध कथन के कारण संपूर्ण शास्त्र को झूठा नहीं माना जाना चाहिए। कषायें छुड़ाना बहुत कठिन हैं; अतः अनेक तरह की बातें यहाँ मात्र शरीर-मोह को कम करने के लिए लिखी होती हैं; जिन्हें सही संदर्भ में लेना चाहिये।

द्रव्यानुयोग सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। इसे ‘न्याय-शास्त्र-का अनुयोग’ कहना अनुचित नहीं होगा। इसमें द्रव्य, गुण, पर्याय अर्थात् ‘वस्तु-स्वभाव’ का निरुपण हुआ है। संपूर्ण जगत् के स्वभाव का इसमें लेखा-जोखा हैं। न्याय की कसौटी पर सप्त तत्त्वों एवं आत्मा-का-निर्णय यहीं प्रमाणित हुआ है। प्रमाण, नय एवं भेद-विज्ञान द्वारा इस अनुयोग में ‘वस्तु-स्वरुप’ का तर्कसंगत निरुपण किया गया है।

वैसे शास्त्रों में अनुयोगों का मिला-जुला रुप ही उपलब्ध हैं; अतः पाठक को प्रासंगिकता का ध्यान रख कर ही अनुयोग-स्वाध्याय करना चाहिये। किसी भी एक अनुयोग का अध्ययन करने से एकाकी दृष्टिकोण बनता है; अतः अनुयोगों का तुलनात्मक स्वाध्याय करना ही उचित है।

स्वाध्यायर्थी को अनुयोग-पद्धति के अतिरिक्त भी अनेक अन्य बातों का ध्यान रखना चाहिये। सबसे पहले तो यह कि किसी भी शास्त्र के कथन को निरपेक्ष न समझें। कोई भी वाक्य शब्दों-की-सीमा में निषद्ध होता है; अतः वह एक समय में एक ही अर्थ प्रकट कर सकता है; अर्थात् वाक्य सदैव सापेक्ष होते हैं, इसलिये अपेक्षा को दिन की रोशनी की तरह ज्ञात करके पढ़ना चाहिये। ऐकान्तिक दृष्टि की अपेक्षा अनेकान्त और स्याद्वाद के प्रकाश में शासत्रों को पढ़ना चाहिये।इसी तरह शास्त्र के प्रणेता के जीवन-वृत्त एवं उसके काल को जानना भी शास्त्र-की-गहराइयों तक पहुँचने के लिए आवश्यक है; अर्थात् शास्त्र का अर्थ क्षेत्र, काल, भाव, और प्रसंग के अनुसार ही समझना चाहिये। इसके अतिरिक्त प्रत्येक शब्द को समझने से पूर्व उसका भावार्थ मतार्थ, आगमार्थ, शब्दार्थ और नयार्थ भी खोजना-जानना चाहिये।

समन्वयवादी दृष्टि विकास समग्र ज्ञान के परिवेश में ही होता है। मनोविज्ञान, दर्शनशास्त्र, व्याकरण, और साहित्य का अभ्यास शास्त्र-की-गहराई में उतरने के लिए आवश्यक है। प्रत्येक वाक्य का अर्थ निचोड़ते वक्त शब्द-शक्तियाँ (लक्षण, अभिदा, व्यन्जना) पर ध्यान देना भी आवश्यक है। साहित्य की सभी विधाओं का ज्ञानी और प्रत्येक विधा की विशेषताओं एवं कमियों का जानकार ही शास्त्र के मर्म को जान सकता है।

सब जानते हैं कि शास्त्र पूर्ण वितरागी द्वारा नहीं लिखे गये हैं। श्रतु केवली एवं अन्य सभी रचनाकारों को श्रतु का राग रहता है, तभी वे उसे लिपिबद्ध कर पाते हैं। इसके अलावा आज श्रतु-संपदा शुद्ध एवं पूर्ण रुप से उपलब्ध भी नहीं है। इसमें प्रयोजनानुसार बहुत सारे अनावश्यक वक्तव्य भी संक्षिप्त हुए हैं, जो जैन सिद्धान्त-के-अनुरुप नहीं हैं। जिस तरह हम पानी को छान कर और गैहूँ आदि को बीन कर काम में लेते हैं, वैसे ही शास्त्र को भी विवेक के छन्ने में छानना और तर्क की रोशनी में बीनना चाहिये। फल में गुटली, छिलके आदि बेकार होते हैं; किन्तु उनका फल की सुरक्षा एवं संरचना के लिए होना आवश्यक है। इसी प्रकार शास्त्र में भी कई-कई बातें होती है; जो अस्तित्व के लिए जरुरी भले ही हों, किन्तु अर्थ-बोध से जिनका संबन्ध अक्सर नहीं होता है; अतः शास्त्र को एक तटस्थ समीक्षक की दृष्टि से पढ़ना चाहिये।

आचार्य समन्तभद्र ने शास्त्र की परीक्षा को अनिवार्य मानते हुए छह मानदण्ड निर्धारित किये हैं। उनके अनुसार वही आप्त वाक्य है, जो तर्क द्वारा अकाट्य हो; जो प्रत्यक्ष और अनुमान के विरुद्ध हो। इसी तरह पूर्वापर विरुद्ध होने पर भी कोई कथन जिनवाणी के ढाँचे में नहीं माना जा सकता। जैनागम का प्रत्येक अंश तत्त्वों-पदेशक एवं सर्वकल्याणकारक होता है। अन्तिम कसौटी है; प्रत्येक वाक्य संसार मार्ग का भंजक होता है। उक्त कसौटियों पर प्रत्येक कथन की परीक्षा करके ही शास्त्र का ग्रहण किया जाना चाहिये। कोई भी कथन जितने-जितने अंशों में उक्त कसौटियों के विरुद्ध है, उतने-उतने अंशों में वह जैनत्व के भी विरुद्ध है; शास्त्र-समस्त नहीं है।

जिनमत का अनुयायी आज जाति, पंथ ओैर सम्प्रदाय के मोह-जाल में जकड़ा हुआ है। सब जानते हैं कि शुद्ध एवं सात्त्विक तथ्य को एक मोही व्यक्ति ठीक से गले नहीं उतार सकता। एक सरल एवं सदाचारी व्यक्ति ही आत्मज्ञान को पचा सकता है। कुटिल व्यक्ति सीधी-सच्ची बात को ग्रहण नहीं कर सकता। तीव्र व्यक्ति नैतिकता की बात पढ़ तो सकता है, लेकिन उसे भलीभाँति पचा नहीं सकता। दिन-भर आपके व्यापार-व्यवसाय में लूट-खसोट करने वाला श्रावक ‘रत्नकरण्ड श्रावकाचार को गले नहीं उतार पायेगा। यौन स्वतन्त्रता की समर्थक आधुनिक युवतियाँ भला अंजना के चरित्र को कैसे समझ सकती हैं? अर्थात् स्वाध्याय करने पर भी चरित्र की शुद्धता के बिना आत्मज्ञान रुच नहीं सकता।

आज अधिकांश साधु भी परम्परावादी, स्थितिपालक एवं साम्प्रदायिक दृष्टिकोण रखते हैं। स्वतन्त्र चिन्तन के अभाव में वे नवीन तथ्य ग्रहण नहीं कर सकते। अपरिग्रह के अग्रदूत कहला कर जो गाड़ी-सहित संघ चलाते हों, जो तन्त्र मन्त्र करते हों, वे ‘गोम्मटसार’ को नहीं समझ सकते। जहाँ साधु का अधिकांश समय अपने अनुयांयियों से घिरे रहने में ही व्यतीत होता हो, जो चेले ढूँढ़ने एवं कर्मकाण्डी व्यवस्थाओं में ही दिन-रात डूबे रहते हों; वे ‘समयसार’ की मर्म-महिमा कैसे जान सकते हैं? परिशोधित कषायों में डूबे साधु ‘कषाय पाहुड’ के रहस्य को कैसे पकड़ पायेगे?

जिनागम-का-स्वाध्याय शब्दों का खेल नहीं है, जिसे हर साक्षर व्यक्ति खेल सके। खुली चित्तवुत्ति, विशाल दृष्टिकोण, लीक से हट कर सोचने की क्षमता, निर्णय लेने की शक्ति, एवं तर्क तथा तारतम्यता का विवेक जिसमें है वही शास्त्रों के अंतरंग तथ्यों को समझ सकता है। जिसमें चरित्र की पवित्रता है और व्याकरण एवं साहित्य का ज्ञाता है तथा प्रकृति को खुली किताब की तरह पढ़ सकता है, वही शास्त्र की गहराइयों को समझ सकता है। आचार्य कुन्दकुन्द के शास्त्र को आचार्य कुन्दकुन्द की मनोभूमिका में उत्तर कर ही अच्छी तरह समझा जा सकता है।

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