अपेक्षा जीवन में आनन्द को कम करती हैंः आश्चर्य जीवन में आनन्द को बढ़ाता हैं

श्री श्री रविशंकर ने जीने की कला में इस सूत्र को बहुत प्राथमिकता दी है। उनका कहना है कि अपेक्षा रखने से जीने का मजा कम हो जाता है। जबकि आश्चर्य जीवन के आनन्द को बढ़ाता है अतः अपेक्षा कम रखें। जैसा कि हम सदैव दूसरों से अपेक्षा करते है। अपेक्षा पूरी होने पर भी उसमे से आनन्द लुप्त हो जाता है क्योंकि अपेक्षा आशा का ही दूसरा रूप है। सामान्यतः हमारे तनाव दूसरों सेे अपेक्षा पूरी न होने के कारण होते है। हम व्यक्ति,वस्तु एवं परिस्थिति को अपने हिसाब से घुमाना चाहते है जबकि इनका संचालन अनेक कारणों के तहत् होता है।

संसार की चाबी हमारे पास नहीं है। संसार अपने कारणों से चलता है। व्यक्ति अपनी इच्छा अनुसार इसे चलाना चाहता है एवं वांछित परिणाम नहीं आने पर शिकायत करता है। अपेक्षा पूरी नहीं होने पर रोता है।अचानक जब अपने अनुकूल कुछ घट जाता है तो हमें सुकुन मिलता है। बिना आशा के प्राप्त होने पर हमें आश्चर्य होता है एवं आश्चर्य जीवन में खुशी लाता है। बिना सोचे विचारें जब कुछ मिल जाता तो खुशी बढ़ती है। अर्थात् सहज उपल्बधी अच्छी लगती है।

योजना बद्ध तरीके से प्रयास करने पर जो कुछ मिलता उसमें उतनी खुशी नहीं होती है क्योंकि उसके साथ अपेक्षाएँ जुड़ चुकी होती है।    यधपि अपेक्षा से बचना बहुत कठिन है। अपेक्षा बिना कार्य करना हमारे आदतों में नहीं होता है। फल की इच्छा तो हमारे प्रयत्नों को सघन कराती है। बिना लक्ष्य जीवन में कुछ भी काम करना बहुत कठिन है। एवं बिना अपेक्षा लक्ष्य नहीं बन सकता। लेकिन कह सकते है कि सुखी होने के लिए अपेक्षा हानिकारक है।  तभी तो कृष्ण ने निष्काम कर्म का उपदेश दिया है।

 

3 विचार “अपेक्षा जीवन में आनन्द को कम करती हैंः आश्चर्य जीवन में आनन्द को बढ़ाता हैं&rdquo पर;

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