आत्म-विश्वास: हमारा भीतर ही हमारी प्राप्तियों के लिए जिम्मेदार है

गुब्बारे का रंग नहीं उसमें भरी हवा उसे उड़ाती है। गुब्बारे का उड़ना उसके रंग पर निर्भर नहीं है। गुब्बारा अपने भीतर भरी हुई हवा के हल्केपन से आकाश में उड़ता है। अर्थात्  हमारा अन्तर्मन ही हमारी बाह्य क्रिया कलापों के लिए जिम्मेदार है। हम अपने आत्म विश्वास से ही आगे बढ़ते है। हमारी अपनी धारणा ही हमारी सोच, खुशी एवं सफलता के लिए उत्तरदायी है। हम जैसे अन्दर होते ही वैसे ही बाहर प्रकट होते है। गुरुत्त्वाकर्षण का सिद्धान्त गुब्बारे के रंग को नहीं देखता है। अर्थात् यह बाह्य व्यवहार पर निर्भर नहीं है।

हम सब भी अपनी उन्नति या अवनति के लिए आन्तरिक शक्ति पर निर्भर हंै। हमारे शरीर का आकार-प्रकार या रंग की इसमें कोई भूमिका नहीं है। हम भी अपनी आन्तरिक शक्ति को विकसित कर आगे बढ़ सकते हंै। हमारा भीतर ही हमारे बाह्य आचरण को तय करता है। हमारी जिन्दगी की उड़ान भी हमारी आन्तरिक शक्ति पर निर्भर है। जबकि अधिकांश लोग बाह्य जीवन को सुव्यस्थित करने में लगे रहते है जो उचित नहीं है। हमें अपनी पूरी ऊर्जा अन्तरसत्ता को विकसित करने में लगानी चाहिए। हमारी अन्र्तशक्ति ही जीवन की ऊँचाई को तय करती है। वास्तविक शक्ति आत्मिक शक्ति अर्थात् आत्म विश्वास है। अपने पर भरोसा करें व आगे बढ़ें। विवेकानन्द ने लिखा है कि आत्म विश्वास के बिना व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता है।

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7 विचार “आत्म-विश्वास: हमारा भीतर ही हमारी प्राप्तियों के लिए जिम्मेदार है&rdquo पर;

  1. very nice
    1 pushp hamari or se bhi….

    आत्मविश्वास की डोर
    जब बीमारी का पता चला तब वह शख्स 21 वर्ष का था, डॉक्टर ने कह दिया था कि वह 25 वर्ष से अधिक नहीं जी सकेगा यानी वह 4 वर्ष और जी सकता था। लेकिन आज 30 वर्ष से भी ज्यादा समय गुजर गये, वह सिर्फ न अपना कार्य कर रहे है बल्कि चलने और बोलने में नाकाम होने के बावजूद उन्होंने ऐसे कामों को अंजाम दिया जिसका लोहा पूरी दुनिया मानती है। उस व्यक्ति का नाम है ” डॉक्टर स्टीफन हॉकिंग .”

    ब्रह्मांड के कई रहस्यों को उजागर करने वाले ब्रिटेन के मशहूर वैज्ञानिक डा0 स्टीफन हॉकिंग विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक पेशेवर हैं. स्टीफन हॉकिंग सालों से ALS यानी Amyotrophic Lateral Sclerosis नाम की बीमारी से जूझ रहे हैं। जिसे मोटरन्यूरान भी कहते हैं।

    हॉकिंग विगत 40 वर्षों से व्हील चेयर में कैद हैं। चलने-फिरने में असमर्थ हैं। हाथ-पांव हिलना-डुलना तक बन्द कर चुके हैं। वे 26 वर्षों से बोल नहीं सकते हैं। आज वे स्पीच सिन्थेसाइजर की मदद से बोलते हैं। जिसको उनके लिये एक कम्पनी ने विशेष रूप से तैयार किया है। उनकी व्हील चेयर से एक लैपटॉप से जुड़ा हुआ है।महज कुछ बटन दबाकर वो अपनी बात लोगों तक पहुंचाते हैं।

    आत्मविश्वास एवं इच्छाशक्ति के बदौलत कोई भी कार्य किया जा सकता है. ईश्वर डोर नहीं खींचता, आपकी डोर आपके हांथो में है, यह है आत्मविश्वास.

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