भावी जीवन साथी में क्या खोजना व उसेे कैसे चुनना?

विवाह का अर्थ विशेष रूप से जिम्मेदारी लेना होता है। विवाह केवल संविदा ही नहीं संस्कार एवं एक समझौता भी है। सामान्यतः विवाह जीवन में आवश्यक है, क्योंकि व्यक्ति अकेला जीवन यापन नहीं कर सकता है। लेकिन इसकी सफलता दोनों साथियों की कुशलता/ क्षमता पर निर्भर है। साथी अच्छा हो तो जीवन वरदान बन जाता है वरन जीवन साथी के मन के विपरित मिल जाने पर सब कुछ पाकर भी व्यक्ति हार जाता है। अतः शादी हेतु साथी के चयन में सजगता जरुरी है।
वैसे विवाह करना जरुरी नहीं है। बिना विवाह के भी व्यक्ति अच्छा जीवन जी सकता है। लेकिन यदि कोई अकेले रहने में  अक्षम है तो शादी श्रेष्ठ विकल्प है। क्योंकि शेष विकल्प अधिक खराब है।

अपनी आवश्यकताएँ पहचानें। जीवन साथी कैसा होना चाहिए? हमें भावी साथी में क्या गुण देखने चाहिए? किसके साथ हम खुश रह सकते है? कौन हमें अधिक खुश रखेगा? पत्नी में कौन-कौन से गुण होने चाहिए? कामकाजी महिला चाहते है या गृहलक्ष्मी (होम मेकर) पसन्द करते है। एक नारी किन गुणों के होने पर सफल व बेहतर पत्नी हो सकती है? पुरुष में कौन-कौन से गुण होने चाहिए? कोई महत्वकांक्षी पुरुष पसन्द करेंगे। एक पुरुष किन गुणों के होने पर बेहतर पति हो सकता है? इन पर विचार करना जरुरी है। युवा पुरुष और महिलायें, साथी चुनने का निर्णय लेने में प्रायः बड़ी गलतियाँ करते हैं। तभी तो कई बार प्रेम विवाह तक असफल हो जाते है।
मानव जीवन मे पारिवारिक सुख तथा सन्तान सुख बहुत महत्वपूर्ण है। विवाह की संस्था को बर्टेन्ड रसैल ने तीन बातों पर आधारित माना है-मूल प्रवृति, जीवन का आर्थिक पहलू, तथा धार्मिक दृष्टि। मोटे रूप में हम में मूल प्रवृत्ति समान होती है। लेकिन बचपन में किस प्रवृति पर कितना जोर कौन देता है उस आधार पर इसमें प्राथतिकताएँ बदलती रहती है। हम सब में यौन-नैतिकता, भोजन करने की वृत्ति एवं जीवन-मूल्यों मंे भिन्नता होती है। इसमें सबकी अपनी-अपनी पसन्द बन जाती है। कुछ के विश्वास के आधार पर सोच बनती है। आर्थिक स्तर के आधार पर उपभोग के पैमाने व पसन्द-नापसन्द बनती है। तीसरा धार्मिक दृष्टि से पूरी जीवन दृष्टि बनती है। हानि-लाभ, यश-अपशय, जरूरी व गैर जरूरी का निर्धारण मन में तय होता है। इन तीनों आधारों का पाटर्नर के चयन करते वक्त  ध्यान  रखना चाहिए। जितना इन आधारों में समानता होगी उतनी ही सोच में समानता रहेगी तो  भविष्य में मतभेद उतने ही कम होंगे।ऐसे में मजबूरी में साथ रहना नहीं होगा। ऐसे में  जीवन सुचारू रूप से चलेगा।पति-पत्नी में सार्थक सम्बन्ध हो सकते है।

जीवन साथी के चयन में किसी दबाव को नहीं मानना चाहिए। यह निर्णय बहुत दूर तक जाता है। किसी बाध्यता को इनमें न आने दे। मन को सीमित कर भय के अधीन निर्णय न करें। हाँ करने के पूर्व पूरी तरह सोच समझ ले। एक बार हाँ के बाद यहाँ पीछे हटना आसान नहीं है। फिर इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। यह दो व्यक्तियों की जिन्दगी का सवाल है। अर्थात् भय , दबाव या लालच में निर्णय न करें।
प्रसिद्ध पुस्तक सेक्स एन्ड मेथेमेटिक्स के आस्ट्रेलियाई लेखक क्लाओ क्रेसनेल ने लिखा है कि शादी से पहले कम से कम 12 डेट जरुरी है। डेट का अर्थ विपरित लिंग के मित्र से अन्तरंग वार्ता होता है। बारह डेट के बाद पाटर्नर को चुनने की क्षमता आ जाती है। लेखक के अनुसार इसके बाद निर्णय करने पर विवाह में सफलता की 75 प्रतिशत संभावना है। अपने जीवन-साथी का चुनाव सावधानी से करें। इस एक निर्णय में आपकी सम्पूर्ण प्रसन्नता या दुर्भाग्य का 60 प्रतिशत हिस्सा शामिल होता है। आपके जीवन साथी में आपके दोस्त होने के गुण उसमें होने चाहिए। जिसके आप अच्छे दोस्त हो सकते है, उसे जीवन साथी चुनंे।

शादी हेतु पाटर्नर में निम्न  10 योग्यताओं  को देखना जरुरी है, जिनका वर्णन  अगली पोस्ट में ………..                                                                                           ( To be continued)

2 विचार “भावी जीवन साथी में क्या खोजना व उसेे कैसे चुनना?&rdquo पर;

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