पल-पल सजगता से जीओं ताकि पूरा जीवन आन्नदमय हो जाय!

जीवन जीने की कला आनन्दपूर्ण ढंग से जीना ही है। आनन्द हमसे बाहर नहीं है। इसे प्राप्त करना होता है। यह स्वतः नहीं उपजता है। आनन्द स्थिर (स्टेटिक) नहीं होता है, यह निरन्तर गतिमान है। आनन्द कोई ऐसी चीज नहीं है कि एकदम व्यक्ति अचानक पा जाय और एक जगह पहुँच जाए जहाँ आनन्द का मन्दिर है, दरवाजा खुलेगा और आनन्द उसे मिल जाएगा। नहीं ऐसा नहीं होता है। आनन्द तो कदम-कदम पर है, श्वास-श्वास पर है कि हम कैसे जी रहे है ? हम प्रत्येक पल सजगता से जीते चले तो एक दिन हम पाएगें कि इतना आनन्द इकट्ठा हो गया है कि अब सिवाय अनुग्रह के कुछ भी शेष नहीं हैं, किसको धन्यवाद दूं उसको खोजना पड़ेगा।

इस क्षण को संभालो पूरा जीवन संभल जायगा। वर्तमान में ही जीवन है। शुरुआत मत देखों। आनन्द प्राप्त करने हेतु हमें सजग होना पड़ेगा। सभी प्रकार के ध्यान का मूल लक्ष्य सजगता सिखाना ही है। ध्यान से ही सजगता बढ़ती है। सजगता ही आन्नन्द का मार्ग है। विचार सजगता के दुश्मन हैं। विचार मन को ऊर्जा देते है जिससे मूच्र्छा बढ़ती है। निर्विचार ही सजगता है। विचारों द्वारा भावनात्मक समस्याओं का समाधान नहीं खोजा जा सकता है। जीवन की समस्त समस्याओं का समाधान सजगता में है एवं सजगता से आनन्द बढ़ता है।

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4 विचार “पल-पल सजगता से जीओं ताकि पूरा जीवन आन्नदमय हो जाय!&rdquo पर;

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