सुखी होने के लिए भगवान नहीं, भगवत्ता चाहिए

आकाश में किसी व्यक्तिगत भगवान के अस्तित्व के बारे में मुझे पता नहीं है लेकिन जीवन में भगवत्ता का महत्व हर जगह है। इसलिए जीवन में हमें जीवन में भगवान नहीं भगवत्ता चाहिये। प्रकृति के गुणों को ही भगवत्ता कहते है। धर्म नहीं धार्मिकता आवश्यक है। धर्म तो प्रतीक है, उसकी अभिव्यक्ति तो गुणों के द्वारा ही होती है। भगवत्ता से भगवान बनते है। अतः अपने भीतर भगवत्ता पैदा करो। भगवान बनने का इसके अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग नहीं है।

यदि आपने प्यार से फर्श साफ किया है तो आपने एक तरह का अदृश्य चित्र बनाया है। जिसे अंहकारी मन हीन कार्य बना सकता था। भगवत्ता उसे कला का बड़ा कार्य बना देती है। कहने का अभिप्राय है कि कोई कार्य अच्छा या बुरा नहीं होता। उसके प्रति हमारा दृष्टिकोण उसे रूप देता है। भक्त उसी कार्य को प्रभु का कार्य मानकर आनन्द से करता है। तो दूसरी तरफ नौकर उसे छोटा कार्य मानकर स्वयं को हीन मानता है। तभी  तो कहते है कि  हमें भगवान नहीं भगवत्ता चाहिए।

प्रत्येक पल इतनी प्रसन्नता से गुजारो कि अन्तर्यात्रा हो सके।

5 विचार “सुखी होने के लिए भगवान नहीं, भगवत्ता चाहिए&rdquo पर;

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