क्या हमारा अचेतन मन ही यमलोक का चित्रगुप्त/विधाता है

यमलोक के अधिपति चित्रगुप्त को अचेतन मन ही समझा जाना चाहिए। उनका कार्य क्षेत्र यमलोक वह मन संस्थान जिसमें प्रतिफल को परिणत कर सकने की ईश्वर प्रदत क्षमता मौजूद है। यम, नियमन व्यवस्था एवं अनुशासन को कहते है। यह चेतन मन के कार्य है। लेकिन कार्य की जड़े अचेतन मंें छिपी होती है। हमारा 90 प्रतिशत जीवन अचेतन द्वारा संचालित होता है। आधुनिक मनोविज्ञान की भाषा में अचेतन ही हमारा नियन्ता है। जिसे धर्म की पोैराणिक भाषा में चित्रगुप्त कहाँ गया है, जो हमारा भाग्य लिखता है। प्रतिकात्मक रूप से मस्तिष्क को यमलोक और उसकी मूलभूत सत्ता-चित्त को चित्रगुप्त की संज्ञा देकर शास्त्रकारों ने सही चित्रण किया है। ईश्वर ने सर्वत्र स्व संचालित पद्वति रखी है। ताकि न्याय व्यवस्था अगल से न करनी पड़ी।

हम जैसे-जेैस स्थूल से सूक्ष्म मंे प्रवेश करते हुए आगे बढ़ रहे हैं, वैसे-वेेैसे हमें संकटों और अभावों के वास्तविक कारणों को समझने मंे सुविधा मिल रही है। मोटी बुद्धि सदा संकटों का कारण बाहर ढूँढ़ती है। व्यक्तियों, परिस्थितियों पर ही प्रस्तुत विपन्नताओं का दोष थोपकर चित्त हल्का करने की विडम्बना चलती रहती है। जबकि वास्तव मंे अधिकांश कारण हमारे अचेतन मंे निहित होते है। अर्थात् अचेतन ही हमारा विधाता है। अतः जीवन में सफल होने के लिए अचेतन का उपयोग अपने पक्ष मंे करना आना चाहिए।

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