हास्य चिकित्सा असाध्य रोगों में भी उपादेय

हँसती-मुस्कराती जीवनचर्या स्वस्थ जीवन का मूलभूत आधार है। शरीर के भीतरी अंग-अवयवों की संरचना कुछ इस ढंग से की है कि वे ह्रास-परिहास के वातावरण मंे ही सही रूप से सुसंचालित होते और मानवी स्वास्थ्य बना रहता हैं।असाध्य रोग होने पर भी हँसी न छोड़े।
मुक्त कण्ठ से हँसने से आमाशय आनन्द की लहरों से झंकृत हो उठता है, जिसके फलस्वरूप पाचन क्रिया स्वतः ही बढ़ने लगती है। ह्नदय-स्पन्दन मंे वृद्धि होती है और रक्त प्रवाह बढ़ने लगता है। अर्थात् हँसी-मुस्कान बिखेरना, रक्त संचार केन्द्रों को अनुप्राणित करना और श्वाँस-प्रश्वाँस क्रिया मंे तेजी लाना है। समूची काया में ऊष्मा का प्रवाह बढ़ने से व्यक्ति में ओजस्विता बढ़ती है।शरीर में पेट और छाती के बीच एक ‘डायफ्राम’ होता है, जो हँसते समय कम्पित होता है। जिससे सारे आन्तरिक अवयवों मंे गतिशीलता आती है। नियमित रूप से हँसना सभी अवयवों को ताकतवर और पुष्ट बनाता है। हँसी श्वसव क्रिया को तेज करती है और फेफड़े में रुकी हुई दुषित वायु को बाहर निकालने में सहायक होती है। हँसने के कारण फेफड़े के रोग नहीं होते हैं।

मनोचिकित्सा विज्ञानी जोयल गुडमैन का कहना है कि व्यक्ति को जीवन में एकरसता नहीं आने देनी चाहिए। जीवन मंे चाहे जितना भी संघर्ष करना पड़ता हो, शारीरिक-मानसिक जटिलताओं का सामना करना होता हो, लेकिन जीवन में शुष्कता को प्रवेश नहीं आने देना चाहिए। हँसी का फब्बारा ही वह स्रोत है जो शरीर में  रोग मुक्त करने वाली जीवनी शक्ति को बढ़ाता है और मन मंे नया उत्साह पेैदा करता है।अर्थात् हँसना स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा टाॅनिक है।
कैलीफोर्निया स्थित प्लेफेयर इन कारपोरेट के संस्थापक अध्यक्ष श्री मेरवीस्टीन का कहना है कि वे स्वयं किसी कार्य भार को विनोदपूर्वक हल्के-फुल्के ढंग से लेते हैं और मनोयोगपूर्वक इसे पूरा करने का प्रयत्न करते हैं। लोगों को वे सलाह देते हैं कि अपने काम को गम्भीरता से तो लें किन्तु हल्की-फुल्की मनःस्थिति को बनाये रखें। यहाँ काम को गम्भीरता से न लेने का अभिप्राय गैर जिम्मेदारी नहीं है। बल्कि एक ऐसी मनःस्थिति है जो कार्याधिक्य से प्रभावित नहीं होती है। हँसी प्रदान करने वाले चिकित्सकों ने यह भी निर्धारित कर दिया है कि एक व्यक्ति को दिन में कितनी बार हँसना चाहिए।

हास्य शरीर को झकझोर देता है। जिससे शरीर में अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली अंतःस्रावी प्रणाली सुचारु रूप से कार्य करने लगती है। दिन में एक बार हँसने को दस मिनट नाव के चप्पू चलाने जितना लाभकारी माना गया है।

डेल कारनेगी का कथन है कि हमें हँसी या मुस्कराहट पर कुछ नहीं खर्च करना पड़ता है, परन्तु यह बहुत कुछ पैदा  कर सकती है। पाने वाला भी तृप्त हो जाता है और देने वाला कभी गरीब नहीं होता।

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