असाध्य रोगों का सामना कैसे करेंः उक्त पुस्तिका फ़्री डाउनलोड करें

असाध्य रोगों का सामना कैसे करें नामक पुस्तिका दिवाली पर प्रकाशित करवायी है। उक्त पुस्तिका को आप Download My Booklets  से डाउनलोड कर सकते है। छपी हुई पुस्तक आप मुझसे मंे मंगवा भी सकते हंै।

Terminal Disease

पुस्तिका की विषय वस्तु

असाध्य रोग होने की स्थिति मंे रोगी का मनोबल ऊंचा रखना, उसकी श्रेष्ठतम चिकित्सा कराना, उसके परिजन अपना संतुलन कैसे रखें व रोगी की सेवा कैसे करें आदि प्रश्नों का उत्तर इस पुस्तिका मंे है।
इसमें चिकित्सा सम्बन्धी बात नहीं कर रोगी एवं रोग के प्रबन्धन की चर्चा है। इधर विगत कुछ वर्षों मंे पिताजी को ब्लड कैंसर, मौसी को बे्रन ट्यूमर, बहन को ब्रेन हेमरेज व ससुरजी को लकवा होते मैंनेे देखा है। इधर दो मित्रों हरीश एवं महिपाल को फेफड़ों का कैंसर हो गया है उनका श्रेष्ठ इलाज कराने व रोग का सामना कैसे करें पर गहन मंथन हुआ। तत् सम्बन्धी साहित्य पढ़ा व डाॅक्टरों व रोग को ठीक करने का दावा करने वालों के चक्कर काटे, उन सब का निचैड़ इसमें है।जब हम किसी अच्छी कम्पनी का टीवी खरीदते हंै तो उसके साथ एक अनुदेश पुस्तिका मिलती है ताकि उसका ढंग से उपयोग कर सकें। लेकिन जब बीमार पड़ते है तो ऐसा नहीं होता। हमारे मार्गदर्शन के लिए कोई व्यवस्था नहीं होती है। इसलिए यह अनुदेश पुस्तिका तैयार की गई है।
सहयोग हेतु विशेष निवेदन
इस पुस्तिका पर आपके विचार सादर आंमत्रित है। इस विषय मंे आप अपने अनुभव भी भेज सकते है। यह पुस्तिका मैंने इस विषय पर बड़ी पुस्तक लिखने के लिए बीज रूप मंे  परीक्षण हेतु लिखी है। क्योंकि आपके फीडबेक के आधार पर ही एक नई पुस्तक  का सृजन होगा। पाठकों के फीडबेक से पुस्तक व्यवहारिक एवं सच्चाई के करीब हो जाती है। आप सब भी टिप्पणी देकर मेरे सहयोगी हो सकते है। लिखने की यह एक जीवन्त शैली/विधा है।

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16 विचार “असाध्य रोगों का सामना कैसे करेंः उक्त पुस्तिका फ़्री डाउनलोड करें&rdquo पर;

  1. ek pushp hamara bhi-

    रोगोपचार
    एक रोगी राजवैद्य शार्गंधर के समक्ष अपनी गाथा सुना रहा था। अपच, बेचैनी, अनिद्रा, दुर्बलता जैसे अनेक कष्ट व उपचार में ढेरों राशि नष्ट कर कोई लाभ न मिलने के कारण की वह राजवैद्य शार्गंधर के पास आया था। वैद्यराज ने उसे संयमयुक्त जीवन जीने व आहार-विहार के नियमों का पालन करने को कहा। रोगी बोला, “ यह सब तो मैं कर चुका हूँ । आप तो मुझे कोई औषधि दीजिए, ताकि मैं कमजोरी पर नियंत्रण पा सकूँ । पौष्टिक आहार आदि भी बना सकें तो ले लूंगा, पर आप मुझे फिर वैसा ही समर्थ बना दीजिए।´´ वैद्यराज बोले, “ वत्स ! तुमने संयम अपनाया होता तो मेरे पास आने की स्थिति ही नहीं आती। तुमने जीवनरस ही नहीं, जीने की सामर्थ्य एवं धन-संपदा भी इसी कारण खोई है। बाह्योपचारों से, पौष्टिक आहार आदि से ही स्वस्थ बना जा सका होता तो विलासी-समर्थों में कोई भी मधुमेह-अपच आदि का रोगी न होता । मूल कारण तुम्हारे अंदर है, बाहर नहीं। पहले अपने छिद्र बंद करो, अमृत का संचय करो और फिर देखो वह शरीर निर्माण में किस प्रकार जुट जाएगा।´´ रोगी ने सही दृष्टि पाई और जीवन को नए सॉंचे में ढाला। अपने बहिरंग व अंतरंग की अपव्ययी वृतियों पर रोक-थाम की और कुछ ही माह में स्वस्थ समर्थ हो गया।

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