स्वस्थ होने में साझेदारीः आत्मचिकित्सक बनें

एक बार जब रोग हो गया है तो हजार चीखने चिल्लाने, रोने, मूड़ खराब करने, चिन्ता करने से यह ठीक नहीं होगा। मात्र जीवन का उद्देश्य व भाव समझने व उसका ध्यान रखने से जीवन के प्रति दृष्टि बदल सकती है, जिससे रोगी अपने दर्द, व भय का सामना बेहतर तरीके से कर सकता है। जीवन में उद्देश्य होने से पीड़ा कम हो जाती है। अर्थात जीवन का स्पष्ट उद्देश्य बनाएं।

आज दवाई व डाॅक्टर ही इलाज नहीं करते हैं। रोगी को भी आत्म चिकित्सक बनना पड़ेगा। रोगी को भी अपने भीतर रहने वाले डाॅक्टर को काम करने का अवसर देना होगा। डाॅ. अस्लाम ने बताया है कि मजबूत जिजीविषा और मस्तिष्क के संतुलित होने से अन्तःस्त्र्रावी ग्रन्थियां स्वस्थ बनाने वाले रसायन बनाती है।

विचार कोई अनिश्चित अमूर्त मात्र नहीं है। इसके विपरित, यह अहम् जीवन शक्ति है, जो संसार में सबसे महत्वपूर्ण, सूक्ष्म और अदम्य है। अपने विचारों की शक्ति के माध्यम से हम सृजनात्मक शक्ति प्राप्त कर सकते है। अर्थात् स्वस्थ होने में विचारों की महत्वपूर्ण भूमिका है। विचार अनुकूलन की शक्ति का प्रयोग करें। अर्थात् स्वस्थ होने के विचार करें।
अस्तित्व में, में ईश्वर में, अपनी चिकित्सा में आस्था रखने से रोग प्रतिरोध क्षमता बढ़ती है। सकारात्मक भाव व विचारों से रोग अपना विस्तार नहीं कर पाता है। प्रार्थना जीवन शक्ति बढ़ाती है।
प्रभु आप जीवन के स्रोत हो

मुझे खुलकर अपना मधु पीने दो

मेरे दिल के अन्दर आप उठोे

अनन्त सम्भावनाओं को खोलो।

 

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