जीवन में प्रक्रिया/तकनीक को पूर्णता से करने पर वांछित परिणाम

जीवन में प्रक्रिया/तकनीक को पूर्णता से करने पर वांछित परिणाम आते है। किसी भी प्रक्रिया को पूरी तरह समझ कर पूरे मन के साथ करने पर उसका लाभ मिलता है। आधे-अधूरे मन से करने पर प्रक्रिया का परिणाम नहीं आता है। इसलिए प्रक्रिया को मन से करना जरुरी है। श्री श्री की आॅर्ट आॅफ लिविंग की प्रक्रियाओं का महत्व उनके गुप्त रखने में है। इससे प्रक्रियाओं को फोरी तौर पर कोई नहीं करता है। सुदर्शन क्रिया सिखाने से पूर्व साधक को पूरा तैयार करते है। इसीलिए हर किसी को सिखाने की इजाजत नहीं है। पूर्णता में सिखना जरुरी है। तभी उसे क्रिया के प्रति श्रद्धा आती है, क्रिया के प्रति सम्मान आता हेेै तो संकल्प के साथ करता है। संकल्प के साथ सौ प्रतिशत होकर करता है तो लाभ होता है। प्यास जगा कर महत्व बताना पड़ता है।
जब मैंने गत दिनों ओ टी एस मेैं ‘‘ आप कौन है’’ की एक प्रक्रिया कराई। दोनों व्यक्ति ‘‘ मैं ललित हूँ’’ व ‘‘मैं मेहता हूँ’’ ही करते रहे। वे अपने नाम के आगे गहरे अन्दर न उतर सके। क्योंकि उक्त प्रक्रिया का महत्व अच्छी तरह नहीं समझे थे, उनकी तैयारी न थी। मेरी मित्र सीता पर कुछ प्रक्रियाओं ने कार्य नहीं किया क्योंकि मैंने उन्हें भूमिका बना कर न सीखाया। बातों ही बातो में सिखाने की कोशिश की लेकिन सफलता नहीं मिली।
अन्तर्जगत मंे जाने सम्बन्धी प्रक्रियाएं भी वैज्ञानिक होती है। लेकिन स्थूल की मात्रा इसमें निहित होती है। अतः सम्भागी का मन-दिल उसमें होना जरुरी है। ये भावजगत् से जुड़ी क्रियाएं है इसलिए साधक को भावनात्मक रुप से जोड़ना जरुरी है। इस हेतु जगह, मन, प्यास, साधक को भरोसा होना जरुरी है। इसलिए कुछ विधि विधान भी मदद दे सकते है।
अतः मुझे  अब काॅन्सिलिंग अपने ध्यान कक्ष में ही व अकेले में पूरा समय देकर चरणों में करनी है। तभी उसका लाभ पात्र को मिल सकता है। अन्यथा वह लापरवाही से करता है। क्रिया को पूरा महत्व नहीं देता है क्योंकि उसने उसकी कीमत नहीं चुकाई होती है।

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3 विचार “जीवन में प्रक्रिया/तकनीक को पूर्णता से करने पर वांछित परिणाम&rdquo पर;

  1. प्रक्रिया या तकनीक के पालन की चिंता किसी और चीज़ को बेशक बढ़ा दे पर भाव को उसी अनुपात में कम कर देगी। किसी ने कहा है –
    हैं राग उन्हीं के रंग भरे और भाव उन्हीं के सांचे हैं !
    जो बे-गत, बे-सुरताल हुए, बिन ताल पखावज नाचे हैं !!

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