हमारे विरोधाभास का कारण अलग अलग केन्द्रो से जीना

हमारा मन बहुत क्भिाजित है। मनुष्य बहुत से स्तरों पर जीता है।  अलग-अलअ स्तर पर उसकी मनस्थिति अलग-अलग होती है। Radiating Mind एक समय की सोच अपने लक्ष्य व प्राप्ति के आधार पर होती है। जब प्रसन्नता के तल पर होते है तो सब कुछ अच्छा ही दिखता है। तत्समय जीवन का लक्ष्य प्राप्त होता  सा महसूस होता है। व्यक्ति स्वयं को पूर्ण व खुश पाता है।
दूसरे समय जब कोई लक्ष्य अप्राप्य लगता है व स्वयं को कठिनाईयों में घिरा पाता है। तब वह निराशा सा महसूस करता है। यह भी हमारा ही मन है। ये दोनों सच है। हमारे जीने के तल है। यधपि इनमें विरोधाभास है।
प्रेमिका से प्रेम करने वाला एक बात से नाराज होकर उस पर तेजाब फेंक देता है। प्रेम करने वाला बदला कब लेने लगता है? यह जीवन का रहस्य समझ मंे नहीं आता है।
इस विसंगति के कारण क्या है? क्या इसे मिटाया नहीं जा सकता है। हम एक साथ विरोधाभासी तलों पर कैसे जी  लेते है। फिर हमारे जीवन में  संतुलन का क्या हुआ? हमारे जीवन में एकररुपता कैसे आएं? इसके क्या उपाय है?
मन को समझकर नहीं, उसके साक्षी होना ही उपाय है।

4 विचार “हमारे विरोधाभास का कारण अलग अलग केन्द्रो से जीना&rdquo पर;

  1. सन्तुलन इस लिए नहीं है क्योंकि लोग बाहरी चीजों में ही जीते है , हम इतने सजग नहीं रहते कि हम अपने मन को नियंत्रण में रख सकें , प्रेम सही मायनों में दूसरे का बुरा कर ही नहीं सकता …जीवन मूल्यों का ह्रास हो गया है ।

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