मृत्यु का सामना कैसे करें ?

मृत्यु क्या है? यह कोेई विषेेष घटना नहीं है; यह एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है। षरीर में उत्पाद-व्यय निरन्तर चलता रहता है। सत्यतः नये कोषों का बनना जन्म है; तो पुराने कोषों का मिटना मृत्यु है। श्वास का आना जन्म है, तो ष्ष्वास का जाना मृत्यु हैं।
जीना सातत्य है, जो स्मृति के माध्यम से होता हैं। जीवन सेे हमारा अभिप्रेत निरन्तरता से है, जिसमें तादात्म्य होता है। इसके विपरीत मृत्यु है; उसका अर्थ है। इस सारी प्रक्रिया का अन्त अर्थात् जीवन और मृत्यु के बीच कोई विभाजन-रेखा नहीं है। मृत्यु की समस्या जीवन की ही समस्या का विस्तार हैै।
After Death

ष्षारीरिक मृत्यु प्राकृतिक है, अनिवार्य है। प्रत्येक जन्म लेने वाला मरता हैं। परेशानी कायिक मृत्यु की कम, मृत्यु के भय की अधिक है। मानव दिन-रात मनोवैज्ञानिक रूप से मृत्यु के भय से प्रभावित एवं परिचालित होता है। जीवन में सबसे बड़ा भय मृत्यु का होता है; अतः समस्या मृत्यु के भय से मुक्त होने की है। मौत का साया जो प्रतिक्षण जीवन  में विष घोलता है, वही समस्या है; अतः मुख्य प्रश्न मृत्यु-के-भय के मुक़ाबले का है।

मानसिक भय का निदान करनेे से पूर्व हमें समझना होगा कि डर का जन्म कहाँ से होता हैं। एवं डर को बढाने में कौन-से कारण सहायक है; इसका विश्लेषण करना पड़ेगा। मननशील व्यक्ति ने बाह्म जगत् में होने वाले परिवर्तनों, आपदाओं, बीमारियों एवं अकाल मौतों को देख कर अनुमान लगाया, कि उसे भी एक दिन मरना पड़ेगा। यहीं से व्यक्ति फन्दे में आ गया।
विचार-द्वारा उत्पन्न भय का सामना भी व्यक्ति विचार द्वारा ही करता है। प्रथमतः मैं ही समस्या को प्रकट करता हैं, फिर वही समाधान के उपाय करता है। शरीर की सुरक्षार्थ रोटी, कपड़ा, मकान पर ध्यान देता है। साथ ही अकेला स्वयं को अधिक असुरक्षित अनुभव करता है, तो समूह में रहना पसन्द करता जाता है।
मानव-सभ्यता के चरण ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते गये, त्यों-त्यों भौतिक उन्नति होती गयी; लेकिन मनोवैज्ञानिक रूप् से ‘भय’ की समस्या बनी रही। इस विकास-यात्रा के  क्रम में परिवार, धर्म, गाँव, समाज, जातिवाद, शहर, क्षेत्रीयतावाद एवं राष्ट्रवाद बने।
विज्ञान ने उपभोक्तावाद को जन्म दिया। अनेक उत्थान-पतन होते रहे; लेकिन ‘मृत्यु-का-भय’ मनुष्य को नचाता रहा। अनेक महापुरुष हुए, अनेक धर्म बने, नाना धारणाएँ बनीं। महावीर और बुद्ध जैसे मनीषियों ने मृत्यु-भय को जीता; लेकिन उनकी व्यक्तिगत जीत से समाज में पन्थ बने, पाखण्ड पनपे एवं भय का प्रश्न सुलगता रहा; अर्थात् ज्यों-ज्यों दवा की मर्ज बढ़ता गया।
विकास के उपक्रम में व्यक्ति समाज का साध्य न रह कर साधन बन जाता है। वह अपनी निजता एवं स्वतन्त्रता खो देता है। व्यक्तिगत मन समाप्त हो जाता है। वह अपनी निजता एवं स्वतन्त्रता खो देता है। व्यक्तिगत मन समाप्त हो जाता है। मनुष्य अर्द्धचेतन एवं अचेतन में सुप्त कुण्ठाओं से संचालित होने लगता है। नकारात्मक चक्र में फँस जाता है। वह अपनी ही निर्मित मान्यताओं केे जाल में उलझ जाता है। ऐसे में हम अपने बन्दीगृह को पहचान नहीं पाते है। मात्र कारागार बदलने को सुधार मानते जाते हैं।
मानव-मन कम्प्यूटर के सदृष्य ही होता है; जैसा इसे ‘फीड’ किया जाता हैं, वैसा ही परिणाम देता है। मानव-मस्तिष्क को समाज नियोजित कर प्रतिबन्धित कर देता है। नियोजित मन निश्चित उत्तर देता है। इस प्रकार मानव एक कुचक्र का दास हो जाता है। जीवन में मान्यताएँ प्रधान हो जाती है एवं सृजनशीलता समाप्त हो जाती है। मनुष्य शनैः-शनैः मूच्र्छित होता जाता है। एक सृजनशीलता मानव के सजग मन को मशीन बना दिया जाता हैं। धर्म,परम्परा, सभ्यता, एवं संस्कृति की मान्यताओं का लेप मस्तिष्क पर चढ़ता जाता है। इस प्रकार व्यक्ति प्रतिबद्ध हो जाता है। मानव अपनी सहजता खो कर जड़ यन्त्र बनता जाता है। परिस्थितियों के अनुसार मन रेडीमेड जवाब देता रहता है। इसका उपयोग असामाजिक तत्व अपने पक्ष में करते जाते हैं। शोषण की वही कहानी है। इस तरह एक संवेदनशील मन को मूढ़ और निष्क्रिय बना दिया जाता है। इस तरह समूचे विकास का अर्थ मानसिक शान्ति के विरूद्व होता जाता है।
इसके अतिरिक्त मृत्यु के भय का सामना करने के उपक्रम में धर्म-गुरूओं ने आत्मा-की-धारणा, पुनर्जन्म-का-सिद्वान्त एवं मोक्ष-की-खोज की है। यह सब मन के प्रक्षेपण (उत्पाद) हंै। तभी तो जिज्ञासु होकर भी व्यक्ति मूच्र्छा में डूबता है। कैसी विडम्बना है कि आत्मा की शाश्वतता की घोषणा करने वाला मृत्यु से डरता है। सिद्वान्त रूप में स्वयं को अजर अमर घोषित करने वाला साॅप देख कर भाग खडा होता है अर्थात सूचनात्मक ज्ञान के होने से व्यक्ति रूपान्तरित नही होता है। व्यक्ति का चूंकि अनुभव मृत्यु को देखने का होता है। हमें प्रतिपल परिवर्तन का अनुभवात्मक ज्ञान होता है। अतः उसे सूचनात्मक ज्ञान पर भरोसा नही होता है। इस प्रकार हमारे मन में दोनों प्रकार के ज्ञानों की रस्साकशी चलती है और व्यक्ति पिसता जाता है। जीवन में उक्त प्रकार के द्वन्द्व ही दःुख है।
हम जीवन और मृत्यु के बीच किसी व्याख्या से, किसी पारलौकिक सातत्य में विश्वास से इन दोनों के बीच की खाई को पाटना चाहते हैं, जो पलायन है। हम ज्ञात की परिणति हैं और अज्ञात (मृत्यु) को जानना चाहते हैं। यही संघर्ष है। रूपी शरीर पर होने वाली संवेदनाओं से अनभिज्ञ अरूपी चेतना को उसकेे बहुविध आयाम में कैसे जानें ?
जो चीज अवश्सम्भावी है उसका भय क्यों है ? हम होनी को क्यों नहीं स्वीकारते ? मृत्यु का जो दरिया हम प्रतिपल पार कर रहे हैं, उसका अवलोकन क्यों नहीं जोते ?समस्या का सामना विचारों द्वारा (पलायन) क्यों करते हैं ? क्या बर्फ पिघलने से डरती है ? क्या पेड़ सूखने से डरता है या उसका विरोध करता है ? क्या बहती नदी अपना मार्ग बनाने में दिमाग लगाती है ? क्या वह अपने तटों का निर्माण करती है? नहीं; तो फिर मनुष्य वैसा क्यों करता है ? वस्तुतः तकों से भय-मुक्ति संभव नहीं है।
मृत्यु का सामना मन्त्रोच्चारण, पूजा-अर्चना, सिद्धान्तों, पद्धतियों, अनुकरणों द्वारा नहीं किया जा सकता। मौत जीवन-रूपी सिक्के का दूसरा पक्ष है। यह जीवन से परे नहीं है। जीवन की पहेली जो बूझ लेते हैं। उनके लिए मृत्यु रहस्य नहीं रहती। जब तक जीवन समस्या हैं, तब तक मृत्यु की समस्या विद्यमान हैं। मौत जीवन की समस्या का ही विस्तार है। जीवन जन्म और मृत्यु के बीच का जोड़ है। मृत्यु कोई समस्या नहीं हैं। यह एक स्वाभाविक परिणति है। बनना व बिगडना पदार्थ की पहचान हैं। बनने वाला पदार्थ विघटित होता है। हम इस प्रक्रिया के प्रति सोये हुए हैं। मृत्यु हमसे बाहर नहीं है। यह कोई कल्पना नहीं हैं, निरन्तर प्रक्रिया है। सह जीवन का यथार्थ है। हम विचारों में, कषायों में, एंव सपनों में डूबे रहने के कारण यथार्थ से अवगत नहीं होते हैं और ठोस शरीर को ही यथार्थ मान लेते हैं। इस पर होने वाले जैव-वैद्युत एवं भीतर होने वाली जैव-रासायनिक क्रियाओं के दर्शन नहीं कर पाते हैं। यही मूच्र्छा है।
हम अनेक बन्धनों में जकड़े हुए हैं। इच्छाओं, वासनाओं, कामनाओं के जाल में फैसे हुए हैं अर्थात् हम ‘स्व’ को नहीं जानते; अतः सहज नहीं रहते। सदैव कुछ बनने की प्रक्रिया के शिकार हो जाते हैं। अतीत और भविष्य की बेड़ियों में बन्द रहते हैं। जीवन के लक्ष्य की सिद्धि में खो जाते हैं। सिद्धि के प्रयोजन में विचारों को दबाते, उठाते, एवं रूपान्तरित करते रहते हैं। इस उत्पात में हम स्वयं को भूल जाते हैं एवं प्र्रमादवश बहते रहते हैं। पदार्थ, समय एवं आकाश जो कि निरपेक्ष हैं, उनका तादात्म्यीकरण कर हम उसमें लोट लगाते रहते हैं। इनका व्यक्तिकरण एवं नामकरण कर हम उसमें फँस जाते हैं। इस प्रकार ज्ञान गुण अपने को छोड़ अन्य क्षेत्रों में विचरण करने लगता है; फलस्वरूप हम स्वयं को जान नहीं पाते हैं। ज्ञान गुण को पर में विचरते देख हमारा अहम् उससे निजता स्थापित कर लेता है। यद्यपि यह काल्पनिक होती है; तथापि यह प्रतिबद्धता छूटे तभी अवलोकन की क्षमता प्रकट हो सकती है, अतः समस्या बनी रहती है।
मृत्यु का भय अपने आप में कोई उलझन नहीं हैं। मृत्यु जीवन का ही दूसरा तट है। जो प्रथम तट को समझता है, उसकेे लिए मृत्यु का भय स्वतःइ समाप्त हो जाता है। प्रतिबद्धता पुर्ण जीवन, इच्छाओं एवं आकुलता भरा जीवन असली समस्या हैं। सजगता द्वारा जो अपने तन-मन-धन में उठती प्रत्येक तरंग, कम्पन एवं विचार को तटस्थता में जान लेता है, वह वर्तमान में जीता हुआ अपनी समस्त उलझनों को मिटा देता है। अतीत और भविष्य, काल और क्षेत्र से ऊपर उठ जाता है; यानी सहज ज्ञाता-दृष्टा बन जाता है।
इस प्रकार के अवलोकन से मन में उठते विकल्प स्वतः षान्त हो जाते हैं। समस्याएँ विसर्जित हो जाती है। तनाव लुप्त हो जाते हैं। भय स्वतः मिट जाते हैं। चूँकि सीमित मन असीम का अनुभव कर लेता है। तब ज्ञात मन स्वतः ही ‘अज्ञात’ को जानने लगता है। व्यक्ति असमय एवं अनन्त हो जाता है। ऐसे में मौत का सामना करने की समस्या लुप्त हो जाती है। पाने की इच्छा के विसर्जन के साथ ही खोने का प्रश्न मिट जाता है, अर्थात् प्रमाद जीवन की समस्या है। और सजगता उसका समाधान।

4 विचार “मृत्यु का सामना कैसे करें ?&rdquo पर;

  1. uthojago.wordpress.com/) पोस्ट ” मृत्यु के बाद का सफ़र .. ” पर

    I believe in this philosophy but can u give me some evidences
    आपकी कई पोस्ट पढी । मेरे हिसाब से ये बेसिक नालेज है । वो भी उधार की । या प्रेरित की हुयी ।
    खैर । मुझे आप का सिर्फ़ एक महीने का समय चाहिये । आपकी सभी धारणायें बदल जायेगी । जीवन बदल जायेगा ।
    आप उसको but can u give me some evidences ? प्रमाणित तौर पर जानेंगे । देखेगें ।
    और बहुत कुछ पायेंगे । लेकिन इससे पहले बेहतर है । आप मेरे ब्लाग पर कुछ और लेख पढें । जो आत्म ग्यान के
    बारे में है । अंतर यही है । कि इनमें लिखा हुआ । मेरे प्रक्टीकल में भी है । आपका evidences ये प्रश्न तो
    बहुत छोटा है । वैसे आपसे पहली बार मिलकर खुशी हुयी । धन्यवाद ।

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